राष्ट्रपति के समक्ष बस्तर की आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक
रायपुर, 7 फरवरी 2026 – शनिवार का दिन बस्तर के इतिहास में अविस्मरणीय बन गया, जब संभाग स्तरीय ‘बस्तर पण्डुम’ के शुभारंभ अवसर पर देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर की आदिम संस्कृति का सजीव अनुभव किया।
इस अवसर पर बास्तानार क्षेत्र के आदिवासी युवाओं द्वारा प्रस्तुत विश्व-प्रसिद्ध ‘गौर नृत्य’ ने परिसर को ढोल की थाप और घुंघरुओं की झनकार से गुंजायमान कर दिया। राष्ट्रपति ने इस मनोहारी प्रस्तुति का तन्मयता से अवलोकन किया और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निकट से महसूस किया।
नृत्य का सांस्कृतिक महत्व:
बास्तानार के युवाओं द्वारा प्रस्तुत यह नृत्य केवल प्रदर्शन भर नहीं था, बल्कि ‘दंडामी माड़िया’ (बाइसन हॉर्न माड़िया) जनजाति की परंपराओं, जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज था। पुरुष नर्तकों के सिर पर गौर के सींगों वाले मुकुट और महिला नर्तकियों की पारंपरिक वेशभूषा ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
प्रस्तुति की विशेषताएँ:
- पुरुष नर्तक जंगली भैंसे की मुद्राओं की प्रभावशाली नकल करते हुए नृत्य कर रहे थे।
- महिला नर्तकियों ने थमी ‘तिरूडुडी’ (लोहे की छड़ी) से ताल मिलाकर नृत्य को लयबद्ध बनाया।
- नृत्य में माड़िया जनजाति की शिकार-परंपरा, साहस और अदम्य ऊर्जा स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
- गोलाकार घेरे में थिरकते युवक और युवतियों ने आधुनिक समय में भी बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों को संजोए रखा।
राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया:
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की गरिमामयी उपस्थिति में यह सशक्त और भावपूर्ण प्रस्तुति न केवल बस्तर पण्डुम की सफलता का प्रतीक बनी, बल्कि इसने बस्तर की लोक-कला, जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक वैभव को राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।




