March 3, 2026

बस्तर में पर्यटन, पर्यावरण और सुरक्षा संकट: गुफा का नुकसान, हादसे और सांस्कृतिक उत्सव की तैयारियां

बस्तर जिले में हाल के दिनों में पर्यावरण, सुरक्षा और सामाजिक गतिविधियों को लेकर कई घटनाएं सामने आई हैं। जगदलपुर के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में खोजी गई लाखों साल पुरानी ग्रीन केव अब अस्तित्व के संकट में है। पर्यटन स्थल बनाने की जल्दबाजी ने इस गुफा की हरी जैविक चमक को फीका कर दिया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह हरियाली सूक्ष्मजीवी परतों से बनी थी और दोबारा बनना असंभव है। निर्माण पर रोक के बावजूद काम जारी रहने और गुफा को पानी से धोने की तैयारी ने नई तबाही का संकेत दिया है। करीब 50 लाख रुपये की योजना पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जबकि पर्यावरण प्रेमियों की आपत्ति के बाद मामला अदालत तक पहुंच गया है।

इसी बीच शहर के कोतवाली क्षेत्र में एक युवक ने इंद्रावती नदी के नए पुल से छलांग लगाकर अपनी जान गंवा दी। रातभर खोजबीन के बाद शव बरामद हुआ, जिससे पुलिस परिवार और इलाके में शोक की लहर फैल गई। मौसम में उतार-चढ़ाव का असर भी लोगों पर दिखने लगा है। महारानी जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है, विशेषकर सांस संबंधी परेशानियों और बच्चों में सर्दी, खांसी व दस्त के मामलों में इजाफा हुआ है। हल्की बारिश और पश्चिमी विक्षोभ के कारण तापमान में उतार-चढ़ाव देखने को मिला, और अगले 6 दिन तक मौसम अनिश्चित रहेगा।

फागुन मंडई में जनजातीय संस्कृति की परंपराएं जीवित हैं। चौथी पालकी के साथ लम्हा मार और गंवरमार जैसे नृत्य रातभर चले, जबकि हजारों लोगों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया। वहीं बचेली की NMDC डिपॉजिट-5 खदान में सड़क निर्माण के दौरान असुरक्षित पोकलेन मशीन फिसल गई और ऑपरेटर गंभीर रूप से घायल हुआ।

माड़पाल में ऐतिहासिक राजशाही होली की तैयारियां शुरू हो गई हैं। 600 साल से अधिक पुरानी परंपरा के तहत रथारोहण और होलिका दहन की तैयारी जारी है, जिसमें इस बार तेंदू लकड़ी का उपयोग किया जाएगा। वन क्षेत्र पर खेती के दबाव और वन अधिकार पट्टा योजना के कारण पर्यावरण संकट भी बढ़ रहा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि संतुलन नहीं बना तो नुकसान अपूरणीय हो सकता है।

नक्सल प्रभावित सुकमा में बदलाव की तस्वीर भी देखने को मिली है। 70 आत्मसमर्पित युवाओं को स्मार्टफोन और प्रशिक्षण किट प्रदान किए गए, जिससे उन्हें डिजिटल शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाया जा सके। प्रशासन ने पुनर्वास को केवल आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि नई जिंदगी का अवसर बताया। बस्तर की यह कहानी विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने रखती है।