जगदलपुर। देश से माओवाद खत्म करने की तय समयसीमा 31 मार्च 2026 नजदीक है और बस्तर में नक्सली गतिविधियों पर काफी हद तक नियंत्रण भी देखा जा रहा है, लेकिन इस निर्णायक मोड़ पर एक बड़ी चुनौती अब भी बरकरार है—जमीन के नीचे छिपे आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस)।
भले ही बंदूकें खामोश होती नजर आ रही हों, लेकिन आईईडी अब भी सुरक्षाबलों के लिए सबसे घातक खतरा बना हुआ है। पिछले ढाई दशकों के आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को साफ तौर पर दर्शाते हैं।

साल 2001 से 2026 तक बस्तर में आईईडी ब्लास्ट की कुल 1277 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन हमलों में 443 जवान शहीद हुए, जबकि 915 जवान घायल हुए। वहीं 158 आम नागरिकों की जान गई और करीब 250 लोग घायल हुए हैं।
अगर सबसे खतरनाक दौर की बात करें तो साल 2010 बस्तर के लिए सबसे भयावह साबित हुआ, जब अकेले आईईडी विस्फोटों में 101 जवानों ने अपनी जान गंवाई थी। हालांकि वर्ष 2026 अब तक राहत भरा नजर आ रहा है, क्योंकि इस साल आईईडी से एक भी जवान के शहीद होने की खबर नहीं है।
नक्सल उन्मूलन की दिशा में अब रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया है। सुरक्षाबल अब केवल मुठभेड़ पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि आईईडी को पहले ही खोजकर निष्क्रिय करने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। पिछले 26 वर्षों में फोर्स ने 4580 आईईडी बरामद किए हैं, जिनमें से साल 2025 में रिकॉर्ड 860 आईईडी जब्त किए गए।
विशेष रूप से करेगुट्टा ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में आईईडी बरामदगी ने माओवादियों की रणनीति को बड़ा झटका दिया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है, लेकिन उसका छोड़ा हुआ खतरा अब भी जमीन में दबा हुआ है।
इस चुनौती को सरकार भी स्वीकार कर चुकी है। उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने स्पष्ट कहा है कि जिस तरह गांवों को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्त) बनाया गया, उसी तरह अब बस्तर को आईईडी मुक्त बनाने का अभियान चलाया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के बाद भी आईईडी का खतरा लंबे समय तक बना रह सकता है। ऐसे में बस्तर की वास्तविक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए “बारूद मुक्त” अभियान ही अगला बड़ा लक्ष्य होगा।





