जगदलपुर। बस्तर, जो कभी माओवादी संगठन का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां अब हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और अंदरूनी इलाकों में सक्रिय माओवादी संगठन (PLGA बटालियन) लंबे समय तक जिन हथियारों और रणनीतियों के दम पर अपना प्रभाव बनाए हुए था, वही हथियार अब लगातार सुरक्षा बलों के हाथ लग रहे हैं।
कभी AK-47, INSAS, SLR, LMG और BGL जैसे अत्याधुनिक हथियारों के जरिए बड़े हमले और एंबुश को अंजाम देने वाला माओवादी नेटवर्क अब दबाव में दिखाई दे रहा है। सुरक्षा बलों की लगातार सर्चिंग, मुठभेड़ और दबिश अभियानों में बड़ी संख्या में हथियार बरामद किए जा रहे हैं।
लगातार ऑपरेशन से हथियारों की रिकवरी तेज
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार अब फोकस केवल मुठभेड़ों पर नहीं बल्कि माओवादियों की सैन्य क्षमता को पूरी तरह खत्म करने पर है। इसी रणनीति के तहत जंगलों में छिपाए गए हथियार डंप लगातार खोजे जा रहे हैं।
माओवादी वर्षों से हथियारों को गुफाओं, जमीन के अंदर और जंगलों के गुप्त ठिकानों में छिपाकर रखते थे, जिन्हें अब सुरक्षा बल बरामद कर रहे हैं।
हथियार बरामदगी के आंकड़े (बढ़ता ग्राफ)
प्रदेश गठन के बाद से अब तक बस्तर में 3500 से अधिक हथियार बरामद किए जा चुके हैं।
- 2020: 89 हथियार
- 2021: 80 हथियार
- 2022: 61 हथियार
- 2023: 35 हथियार
- 2024: 286 हथियार
- 2025: 677 हथियार (रिकॉर्ड स्तर)
- 2026 (अब तक): 316 हथियार
आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में हथियारों की रिकवरी में तेजी आई है, जो माओवादी नेटवर्क की कमजोर होती स्थिति को दर्शाता है।
बड़े ऑपरेशन और हथियार लूट की घटनाएं
सुरक्षा बलों के अनुसार कई बड़े हमलों और घटनाओं में माओवादियों ने शस्त्रागार लूट, जवानों से हथियार छीनने और अवैध निर्माण के जरिए हथियार हासिल किए थे।
- 2004 कोरापुट शस्त्रागार लूटकांड में बड़ी संख्या में हथियार मिले
- 2007 रानीबोदली हमला
- 2010 ताड़मेटला कांड
इन घटनाओं के बाद माओवादियों के पास हथियारों का बड़ा जखीरा पहुंचा था, जिसका उपयोग लंबे समय तक हिंसक गतिविधियों में किया गया।
हथियार निर्माण और सप्लाई नेटवर्क पर भी चोट
जानकारों के अनुसार माओवादी संगठन सीमित स्तर पर कट्टा, सिंगल शॉट गन और BGL जैसे हथियार खुद भी तैयार करता था। इसके अलावा तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश से हथियार सप्लाई नेटवर्क भी सक्रिय था।
हालांकि अब लगातार हो रही कार्रवाई और आत्मसमर्पण के चलते यह नेटवर्क टूटता हुआ दिखाई दे रहा है। कई माओवादी अपने हथियारों के साथ मुख्यधारा में लौट रहे हैं।
सुरक्षा बलों की रणनीति से बढ़ा दबाव
सुरक्षा बलों की रणनीति अब पूरी तरह बदल चुकी है। लगातार सर्च ऑपरेशन, अंदरूनी इलाकों में कैंप विस्तार और तकनीकी निगरानी से माओवादी गतिविधियों पर कड़ा दबाव बना है।
विशेष रूप से करेगुट्टा ऑपरेशन और अन्य बड़े अभियानों में हथियार निर्माण और स्टोरेज से जुड़े कई ठिकानों का खुलासा हुआ है, जिससे संगठन की कमर कमजोर हुई है।
कमजोर होता माओवादी संगठन
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि हथियारों की लगातार बरामदगी माओवादी संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी है।
जहां कभी यह हथियार दहशत का प्रतीक थे, अब वही हथियार संगठन के पतन और बिखराव की कहानी बयान कर रहे हैं। लगातार आत्मसमर्पण और हथियार छोड़ने की घटनाएं भी इसी बदलाव को मजबूत कर रही हैं।





