📰 CG Special Story
छत्तीसगढ़ को भले ही धान का कटोरा कहा जाता हो, लेकिन बस्तर जैसे आदिवासी अंचल में हाईब्रिड खेती के बढ़ते चलन ने पारंपरिक देसी धान की किस्मों को विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया है। ऐसे दौर में कोंडागांव के किसान शिवनाथ यादव और उनकी ‘धरोहर समिति’ उम्मीद की मजबूत मिसाल बनकर सामने आए हैं।
करीब 25 वर्षों की निरंतर मेहनत से शिवनाथ यादव ने धान की 290 देसी और विलुप्त होती किस्मों को संरक्षित किया है, जबकि 44 किस्मों पर शोध कार्य जारी है।

🌱 एक मकसद, एक आंदोलन
धरोहर समिति का उद्देश्य सिर्फ बीज बचाना नहीं, बल्कि किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर पारंपरिक देसी खेती के लिए प्रेरित करना है।
👉 इससे मिट्टी को बंजर होने से बचाया जा सकता है।
👉 भूमि की उर्वरता शक्ति बढ़ती है।
👉 पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है।
बीते 25 वर्षों में यह पहल बीज संग्रहण से आगे बढ़कर कृषि, पर्यावरण और किसानों के अधिकारों का आंदोलन बन चुकी है।
🏡 प्रेरणा से शुरुआत, ‘धरोहर’ की नींव
देसी बीज संरक्षण की प्रेरणा शिवनाथ यादव को मुंबई की संस्था ‘रूरल कम्यूनस’ के संस्थापक स्व. मुन्नीर से मिली। इसके बाद वर्ष 1995 में कोंडागांव के गोलावंड में किसानों का समूह बनाकर धरोहर समिति की स्थापना की गई।
तब से अब तक समिति लगातार देसी किस्मों के संरक्षण और संवर्धन में जुटी है।
🏆 राष्ट्रीय पहचान और सम्मान
धरोहर समिति के कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
पौधा किस्म एवं कृषक अधिकार प्राधिकरण, कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 2016 में समिति को प्रशस्ति पत्र और 10 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि दी गई थी।
🤝 बेचते नहीं, बांटते हैं बीज
धरोहर समिति बीजों का व्यापार नहीं करती।
✔️ किसानों के बीच बीजों की अदला-बदली।
✔️ स्वयं बीज उत्पादन के लिए प्रेरणा।
✔️ कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से संरक्षण।
यह मॉडल किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
⚠️ रासायनिक खेती पर चिंता
शिवनाथ यादव कहते हैं —
“पहले किसान जमीन की प्रकृति के अनुसार धान बोते थे। गोबर की खाद और प्राकृतिक तरीकों से कीट नियंत्रण होता था। आज अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक खाद और दवाओं का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जिसका असर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।”
🧬 पोषण भी, औषधि भी
देसी धान की कई किस्में पोषक और औषधीय गुणों से भरपूर हैं —
🔹 काटा मैहर – प्राकृतिक आयरन युक्त।
🔹 इलायची आलचा – औषधीय उपयोग।
🌾 प्रमुख किस्में
पतला श्रेणी: बादशाहभोग, लोकटी माछी
मोटा श्रेणी: दांदर, कुमड़ा फूल, कुकड़ी मुंही, अलसागार, बासमुही
अर्ली वैरायटी: भूरसी, लालू-14, धंगढ़ी काजर
इन पर लगातार शोध किया जा रहा है।
📈 जैविक खेती की नई संभावनाएं
देश-विदेश में अब ब्लैक राइस, रेड राइस और देसी चावल की मांग बढ़ रही है। इससे —
✅ जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा।
✅ किसानों की आय बढ़ेगी।
✅ बस्तर आत्मनिर्भर कृषि मॉडल बन सकता है।
शिवनाथ यादव मानते हैं कि देसी बीजों को बाजार से जोड़ा जाए तो बस्तर अंतरराष्ट्रीय पहचान बना सकता है।
🌍 विरासत को बचाने की जंग
धरोहर समिति का प्रयास सिर्फ खेती नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा और जैव विविधता बचाने की लड़ाई है।
शिवनाथ यादव जैसे किसान यह साबित कर रहे हैं कि मजबूत संकल्प से विलुप्त होती विरासत को दोबारा जीवन दिया जा सकता है।





