March 4, 2026

Bhilai Police Brutality Case: होटल कारोबारी पर बर्बरता, हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार को ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश

📰 पुलिस की बर्बरता पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के भिलाई में होटल कारोबारी के साथ पुलिस द्वारा की गई बर्बरता पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने व्यवसायी को अवैध रूप से गिरफ्तार कर जेल भेजने को संविधान का उल्लंघन मानते हुए राज्य सरकार को ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही यह भी कहा कि सरकार जांच के बाद दोषी पुलिसकर्मियों से यह राशि वसूल सकती है।

हाईकोर्ट ने गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।


👨‍⚖️ क्या है पूरा मामला

भिलाई के अवंतीबाई चौक निवासी आकाश कुमार साहू, जो लॉ स्टूडेंट हैं और कोहका में होटल संचालित करते हैं, ने पुलिस की अवैध कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका के अनुसार, आकाश साहू विधिवत लाइसेंस लेकर होटल चला रहे थे। 8 सितंबर 2025 को पुलिस अधिकारी होटल पहुंचे और जांच के नाम पर रजिस्टर व पहचान पत्र खंगाले। आरोप है कि बिना महिला पुलिस के एक कमरे में घुसकर वहां ठहरे पुरुष-महिला को बाहर निकाला गया और मैनेजर से दुर्व्यवहार किया गया।


🚨 चोरी का झूठा आरोप, बेरहमी से पिटाई

कुछ देर बाद पुलिस दोबारा होटल पहुंची और कर्मचारियों पर सोने के आभूषण चोरी का आरोप लगाया। कर्मचारियों ने सीसीटीवी जांच की बात कही, लेकिन पुलिस ने कथित तौर पर तलाशी के दौरान होटल मैनेजर की बेरहमी से पिटाई कर दी।

इसके बाद होटल मालिक आकाश साहू को बुलाया गया। उन्होंने खुद को संचालक बताया तो पुलिस ने गाली-गलौज करते हुए उन्हें जबरन हिरासत में लिया, थाने ले जाकर मारपीट की और बिना वैध कारण के जेल भेज दिया।


🛑 पुलिस का पक्ष क्या था

पुलिस का दावा था कि वे एक गुमशुदा लड़की की तलाश में होटल पहुंचे थे। पुलिस के अनुसार आकाश ने सरकारी काम में बाधा डाली, वाहन की चाबी छीनी और ड्राइवर से हाथापाई की, जिससे शांति भंग होने की आशंका बनी। इसी आधार पर उन्हें बीएनएस की धारा 170 के तहत गिरफ्तार किया गया।


📜 हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध दर्ज नहीं था। केवल संदेह और कहासुनी के आधार पर जेल भेजना असंवैधानिक है।

कोर्ट ने कहा—

  • हिरासत में मानसिक तनाव और अपमान अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
  • गिरफ्तारी के समय लिखित में कारण बताना अनिवार्य है।
  • आकाश साहू ने मेमो में लिखा था— “मुझे मामले की जानकारी नहीं है।”

कोर्ट ने एसडीएम की भूमिका पर भी नाराजगी जताई और कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने पुलिस रिपोर्ट पर आंख मूंदकर मुहर लगा दी।


💰 4 सप्ताह में मुआवजा, देरी पर ब्याज

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ सभी आपराधिक कार्रवाई और पुलिस के इस्तगासा को निरस्त कर दिया है। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि 4 सप्ताह के भीतर ₹1 लाख का भुगतान करे।

देरी होने पर 9% वार्षिक ब्याज देना होगा। सरकार को छूट दी गई है कि जांच के बाद यह राशि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूल की जा सकती है।


⚠️ न्याय व्यवस्था पर असर

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि पुलिस की अवैध कार्रवाई, गैर-कानूनी रिमांड और अत्याचार से आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास कमजोर होता है।

कोर्ट ने गृह विभाग को निर्देश दिए कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए।