रायपुर। कभी बीजापुर के अंदरूनी इलाकों में बच्चों के सपनों के सामने नक्सलवाद और डर की दीवार खड़ी थी। गांव से बाहर निकलकर खेल की दुनिया में कदम रखना आसान नहीं था। परिवारों को धमकियों का सामना करना पड़ता था, लेकिन इन मुश्किल हालातों के बीच कुछ बच्चों ने हौसला नहीं छोड़ा। आज यही बच्चे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ के साथ देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
धनोरा, आवापल्ली और पिंडुमपाल जैसे इलाकों से निकले इन खिलाड़ियों ने नेशनल प्रतियोगिताओं में पदक जीतने के साथ चीन और जापान तक भारत का प्रतिनिधित्व किया है। राज्य खेल अलंकरण समारोह में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय इन खिलाड़ियों को सम्मानित करेंगे। यह सम्मान उनकी खेल उपलब्धियों के साथ उन संघर्षों को भी सलाम है, जिन्हें पार कर उन्होंने यह मुकाम हासिल किया।
चीन तक पहुंची रेणुका की प्रतिभा
बीजापुर की रेणुका तेल्लम ने वर्ष 2017 में स्पोर्ट्स एकेडमी से अपने खेल सफर की शुरुआत की। लगातार मेहनत के दम पर उन्होंने 14 नेशनल गेम्स में हिस्सा लिया और तीन कांस्य व दो रजत पदक जीते। रेणुका चीन में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
अब उनका लक्ष्य सॉफ्टबॉल को ओलंपिक खेल का दर्जा मिलने के बाद भारत की ओर से ओलंपिक में खेलना और देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना है।
धमकियों के बावजूद विमला ने नहीं छोड़ा खेल
ग्राम धनोरा की विमला तेल्लम के लिए भी खेल की राह आसान नहीं थी। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बच्चों को हॉस्टल भेजने पर परिवारों को धमकियां मिलती थीं। इसके बावजूद विमला और उनके परिवार ने हिम्मत नहीं छोड़ी। मेहनत के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
समाज की बातों को पीछे छोड़ चंद्रकला ने चुना खेल
आवापल्ली की चंद्रकला को भी खेल के लिए गांव से बाहर जाने पर सामाजिक सवालों और बंदिशों का सामना करना पड़ा। परिवार से कहा जाता था कि लड़की को खेलने के लिए बाहर भेजने से बदनामी होगी। चंद्रकला ने इन बातों की परवाह नहीं की और खेल को अपना करियर बनाया। अब उनकी नजर 2028 ओलंपिक पर है।
पहली उड़ान से जापान तक पहुंचे सुशील
भैरमगढ़ के पिंडुमपाल निवासी सुशील कुड़ियम की प्रतिभा को स्कूल के एक शिक्षक ने पहचाना। इसके बाद उनका चयन स्पोर्ट्स एकेडमी के लिए हुआ। राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें इंडिया ट्रायल और कैंप में जगह मिली।
इसके बाद सुशील भारतीय टीम के साथ जापान पहुंचे। पहली बार विमान में बैठने और विदेश जाने का उनका अनुभव उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। गांव से जापान तक का उनका सफर बताता है कि सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर प्रतिभा किसी सीमा की मोहताज नहीं होती।
चार साल की उम्र में बाल गृह पहुंचे राकेश, अब भारत की जर्सी में
आवापल्ली के राकेश कड़ती की कहानी बेहद संघर्षपूर्ण है। नक्सल हिंसा में पिता की हत्या और बाद में मां के निधन के बाद महज चार साल की उम्र में उन्हें बाल गृह भेज दिया गया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने पढ़ाई के साथ खेल जारी रखा।
राकेश ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने के बाद भारतीय टीम में जगह बनाई। वह जापान में अंडर-18 एशिया कप और बैंकॉक में अंडर-23 एशिया कप में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
नक्सल प्रभावित इलाकों में खेल बन रहा उम्मीद की नई किरण
बीजापुर के इन खिलाड़ियों की सफलता सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह बदलते बस्तर की तस्वीर भी दिखाती है। जिन इलाकों की पहचान कभी नक्सलवाद और हिंसा से होती थी, वहां से अब खेल प्रतिभाएं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच रही हैं।
इन खिलाड़ियों ने साबित किया है कि हालात कितने भी कठिन हों, सही अवसर, प्रशिक्षण और हौसले के साथ प्रतिभा अपनी मंजिल तक पहुंच सकती है।





