July 29, 2026

20 साल पुराने बलवा मामले में आरोपियों को राहत, हाईकोर्ट ने जेल में बिताई अवधि को माना सजा

बिलासपुर। खेती का काम करने वाले व्यक्ति को “चापलूस” कहने को लेकर हुए विवाद में बलवा और मारपीट के आरोपियों को करीब 20 साल बाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। लंबे समय से मामला लंबित रहने और आरोपियों द्वारा पहले ही जेल में बिताई गई अवधि को देखते हुए हाईकोर्ट ने सजा को संशोधित कर दिया। अदालत ने जेल में बिताए गए समय को ही पर्याप्त सजा मानते हुए अर्थदंड की राशि जमा करने के निर्देश दिए हैं।

जानकारी के अनुसार जांजगीर-चांपा जिले के पामगढ़ थाना क्षेत्र के ग्राम धाराशिव में 7 जुलाई 2005 को विष्णु प्रसाद के घर उनकी दादी हराबाई का वार्षिक श्राद्ध कार्यक्रम आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में गांव और रिश्तेदारी के लोग शामिल हुए थे। इसी दौरान घर में खेती का काम करने वाले श्रवण राठौर ने विष्णु प्रसाद को बताया कि गांव के नेगीराम ने उसे “चापलूस” कहा है।

शाम के समय विष्णु प्रसाद ने नेगीराम से इस बात को लेकर पूछताछ की और फिर वापस लौट आए। बाद में रात में जब विष्णु प्रसाद, महारथी, विनोद और संतोष गांव की पान दुकान पहुंचे, तभी वहां कई लोग एकत्र होकर गाली-गलौज करने लगे।

विवाद बढ़ने की जानकारी मिलने पर राधाबाई, हीराबाई, उत्तरा बाई और कमलाबाई भी मौके पर पहुंच गईं। आरोप है कि आरोपियों ने गैरकानूनी तरीके से भीड़ बनाकर विष्णु प्रसाद, महारथी और विनोद पर लाठी, तलवार, कुल्हाड़ी, चाकू और अन्य हथियारों से हमला कर दिया।

प्रकरण में कामता राठौर, कौशल, नेगीराम, सुनील, दिनेश, बबला, बैलिस्टर, दिलीप, बनवासी, अनिल पांडे, लाली चौहान, जुगुनू समेत अन्य लोगों के नाम सामने आए थे। बताया गया कि आरोपी हरिशंकर ने अन्य आरोपियों को हमला करने के लिए उकसाया था।

हमले में कई लोगों को चोटें आईं, जबकि कमल राठौर और विनोद को गंभीर चोटें लगीं और फ्रैक्चर भी हुआ। मारपीट के दौरान विष्णु प्रसाद जमीन पर गिर पड़े, जिन्हें आरोपी मृत समझकर मौके से फरार हो गए। बाद में ग्रामीणों ने घायलों को घर पहुंचाया और पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया और जांच पूरी कर न्यायालय में चालान पेश किया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जांजगीर ने 17 मार्च 2008 को आरोपियों को दोषी करार देते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 147 और 148 के तहत एक-एक वर्ष तथा धारा 326/149 के तहत 3 वर्ष की सजा सुनाई थी। साथ ही 2500 रुपए अर्थदंड भी लगाया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह माना कि घटना वर्ष 2005 की है और अपील 2008 से लंबित थी। साथ ही आरोपी पहले ही एक महीने से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जेल में बिताई गई अवधि को ही पर्याप्त सजा माना।