बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट ने जगदलपुर के ढाई दशक पुराने बहुचर्चित फर्जी वेतन आहरण और भ्रष्टाचार के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा और केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
क्या था मामला
यह मामला जगदलपुर के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है, जहां वर्ष 1979 से 1985 के बीच कथित रूप से फर्जी वेतन बिल बनाकर करीब 42 हजार रुपये के गबन का आरोप लगाया गया था। अभियोजन के अनुसार, तत्कालीन सीएमएचओ डॉ. आरके सेन और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने तीन सफाई कर्मचारियों—जयसिंह, लालमणि और मयाराम—के नाम पर फर्जी बिल बनाकर सरकारी राशि निकाली।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा
जगदलपुर की विशेष अदालत ने 28 जनवरी 2002 को आरोपियों को दोषी मानते हुए आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-बी सहित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 2-2 साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
गवाही में विरोधाभास
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास सामने आए। जिन कर्मचारियों के नाम पर वेतन निकालने का आरोप था, वे स्पष्ट रूप से यह नहीं बता सके कि उन्हें वेतन नहीं मिला या वे काम पर नहीं थे। कई गवाहों ने यह भी कहा कि उन्हें काम के दौरान वेतन मिला और उन्होंने हस्ताक्षर कर भुगतान लिया।
अधीनस्थ कर्मचारियों को राहत
कोर्ट ने यह भी माना कि अधिकांश आरोपी अधीनस्थ कर्मचारी थे, जो अपने वरिष्ठ अधिकारी के निर्देशों का पालन कर रहे थे। उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र आपराधिक मंशा या भूमिका साबित नहीं हो सकी।
साक्ष्यों की कमी पर कोर्ट सख्त
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में विफल रहा। हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान फर्जी होने का कोई विशेषज्ञ प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया। कई दस्तावेज मूल की बजाय केवल कार्बन कॉपी थे, जिससे आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी।
संदेह’ नहीं बन सकता आधार
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया।
जमानत बांड पर निर्देश
अदालत ने निर्देश दिया है कि जो आरोपी जमानत पर हैं, उनके जमानती बांड अगले 6 महीने तक प्रभावी रहेंगे।
यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों की अहमियत को रेखांकित करता है और स्पष्ट करता है कि बिना ठोस प्रमाण के किसी को दोषी ठहराना संभव नहीं है।





