June 13, 2026

Bilaspur News : बालिग बेटी के भरण-पोषण से नहीं बच सकता पिता, हाईकोर्ट ने बरकरार रखा फैमिली कोर्ट का आदेश

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बेटियों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि बालिग होने के बाद भी बेटी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पिता पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते। खासकर तब, जब इस संबंध में पहले से फैमिली कोर्ट का आदेश प्रभावी हो। हाईकोर्ट ने पिता की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए बेटी को प्रतिमाह 5 हजार रुपये भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संतान के पालन-पोषण की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी पिता की ही होती है और इससे बचने के लिए वर्षों बाद नए तर्क नहीं दिए जा सकते।

मामला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले का है। याचिकाकर्ता गोरखनाथ यादव ने फैमिली कोर्ट मनेंद्रगढ़ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी बेटी कु. प्रिया को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2016 में 2 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि तय की थी, जिसे वर्ष 2023 में बढ़ाकर 5 हजार रुपये कर दिया गया।

पिता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि बेटी अब बालिग हो चुकी है, इसलिए भरण-पोषण का अधिकार समाप्त हो जाता है। साथ ही यह भी कहा गया कि बच्ची की मां के पास कृषि भूमि और पर्याप्त आय के स्रोत हैं, जिससे उसका पालन-पोषण किया जा सकता है। याचिका में यह तर्क भी दिया गया कि बेटी उनकी वैध पत्नी की संतान नहीं है।

हालांकि अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद कहा कि वर्ष 2016 से भरण-पोषण संबंधी आदेश लगातार प्रभावी है और पिता ने कभी भी उस आदेश को चुनौती नहीं दी। ऐसे में अब अचानक रिश्ते और जिम्मेदारी पर सवाल खड़े नहीं किए जा सकते।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संतान के हित सर्वोपरि हैं और पिता अपनी जिम्मेदारियों से केवल तकनीकी आधार पर मुक्त नहीं हो सकता। अदालत ने इसी आधार पर पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट का आदेश यथावत रखा।