नई दिल्ली। 1 फरवरी को पेश होने वाले Budget 2026 में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है — UPI पेमेंट सिस्टम की आर्थिक स्थिरता। रिकॉर्ड ट्रांजेक्शन के बावजूद पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों को नुकसान हो रहा है, जिससे डिजिटल इंडिया की रफ्तार पर सवाल खड़े हो गए हैं।
10 रुपये की चाय से लेकर 50 हजार के मोबाइल तक आज हर भुगतान UPI से हो रहा है। नोटबंदी और कोरोना के बाद भारत तेजी से कैशलेस इकॉनमी की ओर बढ़ा, लेकिन इस सफलता के पीछे अब सिस्टम पर बढ़ता खर्च छिपा है।
📊 UPI नेटवर्क में दिख रही थकान
विश्लेषकों के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में एक्टिव मर्चेंट QR नेटवर्क की ग्रोथ सिर्फ 5% CAGR रही है। आज भी देश के केवल 45% व्यापारी ही हर महीने UPI स्वीकार करते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि:
- करीब 1/3 पिनकोड में 100 से कम एक्टिव UPI व्यापारी हैं।
- लगभग 70% पिनकोड में 500 से कम व्यापारी UPI लेते हैं।
- जबकि औसतन हर पिनकोड में 2,500 से ज्यादा व्यापारी होते हैं।
यह असंतुलन सिस्टम पर दबाव को दिखाता है।
💸 छिपी लागत बन रही सबसे बड़ी परेशानी
सरकार ने UPI और RuPay पर Zero MDR लागू किया था, जिससे डिजिटल पेमेंट बढ़ा, लेकिन अब इसका बोझ बैंकों और फिनटेक कंपनियों पर है।
RBI के अनुसार,
👉 हर एक ट्रांजेक्शन प्रोसेस करने में करीब ₹2 खर्च आता है।
👉 MDR यानी वह शुल्क जो व्यापारी पेमेंट कंपनियों को देते हैं, फिलहाल शून्य है।
यानी पूरा खर्च बैंक और फिनटेक उठा रहे हैं।
📉 लगातार घट रहा सरकारी इंसेंटिव
PhonePe का कहना है कि शून्य MDR मॉडल टिकाऊ नहीं है।
- 2023-24 में सरकार ने ₹3,900 करोड़ इंसेंटिव दिया था।
- 2024-25 में यह घटकर ₹1,500 करोड़ रह गया।
यह राशि टेक्नोलॉजी, सिक्योरिटी और फ्रॉड कंट्रोल के लिए काफी नहीं है।
🏦 RBI गवर्नर के संकेत
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ कहा है कि,
“UPI हमेशा के लिए मुफ्त नहीं रह सकता। सिस्टम को चलाने का खर्च किसी न किसी को उठाना होगा।”
📌 लॉन्ग टर्म रेवेन्यू मॉडल की कमी
भारतीय भुगतान परिषद (PCI) के मुताबिक मौजूदा ढांचे में स्थायी रेवेन्यू मॉडल नहीं है। PhonePe का अनुमान है कि अगले दो वर्षों में डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम को ₹8,000–10,000 करोड़ निवेश चाहिए।
जबकि इस साल सरकार ने सिर्फ ₹427 करोड़ का प्रावधान किया है।
⚖️ Budget 2026 बनेगा निर्णायक
फिनटेक कंपनियों की मांग है कि:
✅ बड़े व्यापारियों पर सीमित MDR लागू किया जाए।
✅ छोटे दुकानदारों को राहत दी जाए।
✅ सरकार और उद्योग मिलकर टिकाऊ मॉडल बनाएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सुधार नहीं हुआ तो कंपनियों को विस्तार रोकना पड़ेगा, जिससे डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन दोनों प्रभावित होंगे।




