रायपुर। छत्तीसगढ़ की सियासत धर्मांतरण के मुद्दे पर गरमा गई है। आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई धर्म प्रचारकों के प्रवेश पर रोक से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। शीर्ष अदालत ने ग्राम सभाओं द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी है।
अजय चंद्राकर का खुला न्योता
भाजपा के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने मीडिया से चर्चा में कहा कि धर्म प्रचारक सार्वजनिक रूप से अपनी बात क्यों नहीं रखते? उन्होंने कहा कि “मैं स्वयं उन्हें अपने क्षेत्र में सार्वजनिक रूप से प्रचार करने का न्योता देता हूं। गुपचुप तरीके से घर-घर जाकर यह काम क्यों किया जा रहा है?”
विकास उपाध्याय का पलटवार
भाजपा विधायक के बयान पर पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा धर्म के नाम पर राजनीति करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि “कवर्धा से कांकेर तक धर्म से जुड़ी घटनाएं हो रही हैं, और यह भाजपा का राजनीतिक टूल है।”
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ में ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के गांव में प्रवेश पर रोक लगाने संबंधी होर्डिंग/नोटिस बोर्ड के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही ग्राम सभाओं के पक्ष में दिया गया पूर्व निर्णय बरकरार रहा।
प्रदेश के गृहमंत्री विजय शर्मा ने इसे ग्राम सभाओं की बड़ी जीत बताते हुए कहा कि ग्रामीण अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसे कदम उठा सकते हैं।
जानिए क्या था विवाद
विवाद कांकेर जिला की कई पंचायतों में लगाए गए उन बोर्डों से जुड़ा था, जिनमें ईसाई धर्म प्रचारकों के गांव में प्रवेश पर निषेध का उल्लेख था। ग्राम सभाओं का तर्क था कि जबरन या प्रलोभन देकर धार्मिक परिवर्तन की आशंका को रोकने और परंपराओं के संरक्षण के लिए यह कदम उठाया गया।
ईसाई धर्म प्रचारक समुदाय ने इन बोर्डों को चुनौती देते हुए पहले छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का रुख किया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि पेसा कानून के तहत ग्राम सभाएं अपनी परंपरा और सामाजिक संरचना के संरक्षण के लिए ऐसे निर्णय ले सकती हैं, हालांकि याचिकाकर्ताओं को ग्राम सभा के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में दलीलें
शीर्ष अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने दलील दी कि प्रवेश निषेध असंवैधानिक है और बिना पर्याप्त साक्ष्य के धर्मांतरण की आशंका मानी गई है। उन्होंने कहा कि “एक भी कन्वर्ज़न मामले में सजा का रिकॉर्ड नहीं है।”
वहीं केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यदि नए तथ्य हैं तो याचिकाकर्ता पुनः हाईकोर्ट जा सकते हैं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने हाईकोर्ट के फैसले के पैरा 34 का उल्लेख करते हुए मूल प्रार्थनाओं पर ध्यान दिलाया और अंततः अपील खारिज कर दी।
इस फैसले के बाद प्रदेश में सियासी बयानबाजी तेज हो गई है और धर्मांतरण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गया है।





