March 3, 2026

ज्योति मिशन स्कूल यौन उत्पीड़न मामला: हाईकोर्ट ने पलटा फैसला, फादर जोसेफ को उम्रकैद, दो महिला स्टाफ को 7-7 साल की सजा

बिलासपुर।

Bilaspur स्थित High Court of Chhattisgarh ने कोरिया जिले के ज्योति मिशन स्कूल यौन उत्पीड़न मामले में निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है।

मुख्य न्यायाधीश Ramesh Sinha और न्यायमूर्ति Ravindra Kumar Agrawal की डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को दोषमुक्त किए जाने को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए स्कूल के फादर जोसेफ धन्ना स्वामी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। घटना को छिपाने की दोषी दो महिला स्टाफ को 7-7 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई है।

2015 की घटना, 2017 में बरी हुए थे आरोपी

मामला कोरिया जिले के सरभोका स्थित ज्योति मिशन स्कूल का है, जहां चौथी कक्षा की 9 वर्षीय छात्रा हॉस्टल में रहती थी। 9 सितंबर 2015 की रात छात्रा के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी।

पीड़िता के अनुसार, वह रात में बाथरूम गई थी, जहां नशीला पाउडर छिड़का गया था। बाद में कमरे में सोते समय आरोपी ने उसके साथ दुष्कर्म किया।

सुबह जब छात्रा ने इसकी शिकायत सिस्टर फिलोमिना और किसमरिया से की, तो आरोप है कि उन्होंने मदद करने के बजाय उसे पीटा और किसी को न बताने की धमकी दी।

9 जनवरी 2017 को बैकुंठपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

मेडिकल और एफएसएल रिपोर्ट को माना अहम साक्ष्य

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में डॉ. कलावती पटेल की मेडिकल रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें पीड़िता के निजी अंगों पर गंभीर चोट और सूजन की पुष्टि हुई थी।

एफएसएल रिपोर्ट में पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए जाने की पुष्टि भी हुई। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने ठोस गवाही और वैज्ञानिक साक्ष्यों को तकनीकी आधार पर खारिज कर गलत निष्कर्ष निकाला।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बलात्कार पीड़िता की गवाही अपने आप में पर्याप्त साक्ष्य है और उसे स्वतंत्र गवाह से अनिवार्य समर्थन की आवश्यकता नहीं होती।

सजा का विवरण

अदालत ने फादर जोसेफ धन्ना स्वामी को आईपीसी की धारा 376(2) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

वहीं फिलोमिना केरकेट्टा और किसमरिया को आईपीसी की धारा 119 के तहत अपराध छिपाने और पीड़िता की सहायता न करने के लिए 7-7 वर्ष के कठोर कारावास और 5-5 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।

हाईकोर्ट के इस फैसले को न्यायिक व्यवस्था में पीड़िता के अधिकारों की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है।