July 30, 2026

HC का बड़ा फैसला: विभाग की गलती से रुका प्रमोशन तो नहीं लागू होगा ‘नो वर्क, नो पे’ सिद्धांत

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत हर मामले में स्वतः लागू नहीं किया जा सकता। यदि किसी कर्मचारी को विभागीय लापरवाही, प्रशासनिक निष्क्रियता या देरी के कारण समय पर पदोन्नति नहीं मिलती है, तो उसे पदोन्नत पद के वेतन लाभ से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।

यह फैसला सेवानिवृत्त सहायक आयुक्त जी.आर. साहू की ओर से दायर याचिका पर सुनाया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें समय पर डिप्टी कमिश्नर पद पर पदोन्नति नहीं दी गई, जबकि उनके जूनियर अधिकारियों को वर्ष 2011 में ही पदोन्नत कर दिया गया था।

रिव्यू डीपीसी ने भी माना था पात्र

सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष यह तथ्य आया कि विभागीय समीक्षा पदोन्नति समिति (रिव्यू डीपीसी) ने याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए उपयुक्त माना था और उन्हें उनके जूनियर अधिकारियों से ऊपर रखने की अनुशंसा भी की थी। इसके बावजूद विभाग ने लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की।

याचिकाकर्ता ने पदोन्नति के लिए कई बार प्रतिवेदन दिए और न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन उन्हें समय रहते पदोन्नति का लाभ नहीं मिल सका।

हाईकोर्ट ने विभाग को ठहराया जिम्मेदार

मामले में विवाद 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 (सेवानिवृत्ति की तिथि) तक पदोन्नत पद के वेतन लाभ को लेकर था। राज्य सरकार ने ‘नो वर्क, नो पे’ का तर्क देते हुए वेतन लाभ देने से इनकार किया, जबकि याचिकाकर्ता ने कहा कि विभाग की गलती के कारण उन्हें पदोन्नत पद पर कार्य करने का अवसर ही नहीं मिला।

मामले की सुनवाई करते हुए Narendra Kumar Vyas ने कहा कि याचिकाकर्ता पदोन्नत पद पर कार्य नहीं कर पाए, लेकिन इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार नहीं थे। विभागीय निष्क्रियता के कारण उन्हें पदोन्नति से वंचित रखा गया। ऐसे मामलों में ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।

50 फीसदी एरियर्स देने का आदेश

हालांकि अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में डिप्टी कमिश्नर के पद पर कार्य नहीं किया था। ऐसे में संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक डिप्टी कमिश्नर और सहायक आयुक्त के वेतन के अंतर की राशि का 50 प्रतिशत एरियर्स के रूप में चार माह के भीतर भुगतान किया जाए।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित समय सीमा में भुगतान नहीं होने पर संबंधित राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें विभागीय देरी या प्रशासनिक लापरवाही के कारण समय पर पदोन्नति का लाभ नहीं मिल पाया है।