March 3, 2026

छत्तीसगढ़ में आरटीई कानून बदलाव: गरीब बच्चों के लिए निजी स्कूलों की सीटों में 53 हजार से सीधे 19 हजार तक भारी कटौती, भविष्य पर गंभीर संकट

रायपुर: छत्तीसगढ़ में शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत निजी स्कूलों में प्रवेश पाने वाले गरीब बच्चों के भविष्य पर बड़ा संकट मंडराने लगा है। छत्तीसगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल ने राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि सरकार गरीब बच्चों से शिक्षा का हक छीन रही है। उन्होंने आरटीई कानून में किए गए हालिया बदलावों को ‘असंवैधानिक’ करार दिया।

क्रिष्टोफर पॉल ने बताया कि 16 दिसंबर 2025 को आरटीई कानून में किए गए बदलावों का सीधा असर गरीब बच्चों की सीटों पर पड़ा है। पिछले शैक्षणिक सत्र (2025-26) में जहां 53,023 बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला मिला था, वहीं नए नियमों के चलते 2026-27 में केवल 19,495 सीटों पर ही प्रवेश संभव होगा। इस तरह, पिछले 13 वर्षों में यह पहली बार है जब प्रवेश संख्या इतना न्यूनतम स्तर तक गिर गई है।

पैरेंट्स एसोसिएशन ने राज्य सरकार से मांग की है कि आरटीई कानून में किए गए बदलावों को तुरंत निरस्त किया जाए और बच्चों को पुराने प्रावधानों के अनुसार प्रवेश दिया जाए। क्रिष्टोफर पॉल ने कहा कि सरकार की इस कार्रवाई से हजारों गरीब परिवार प्रभावित होंगे, क्योंकि निजी स्कूलों की 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं।13 वर्षों का सबसे निचला स्तर

क्रिष्टोफर पॉल ने वर्ष 2012 से अब तक के प्रवेश आंकड़ों को पेश करते हुए बताया कि पिछले 13 वर्षों में यह पहला मौका है जब सीटों की संख्या इतनी कम कर दी गई है.

शैक्षणिक सत्रप्रवेशित बच्चों की संख्या
2025-2653,023
2022-2356,679 (रिकॉर्ड प्रवेश)
2020-2152,680
2019-2048,167
2026-27 (प्रस्तावित)19,495 (सबसे कम)

नोट: वर्ष 2012 से 2025 तक औसत प्रवेश 40,000 से 50,000 के बीच रहा है.

उन्होंने सीधे तौर पर भाजपा सरकार की मंशा पर सवाल उठाया और कहा कि जनवरी में दो बार पत्र लिखने के बावजूद शासन ने कोई ध्यान नहीं दिया और आरटीई पोर्टल पर कम सीटों के साथ प्रवेश प्रक्रिया शुरू कर दी। पॉल ने इसे कानून की मूल भावना के खिलाफ बताया और चेतावनी दी कि गरीब बच्चों के अधिकारों के साथ समझौता कतई नहीं किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की कटौती न केवल शिक्षा के अवसरों को सीमित करती है बल्कि सामाजिक असमानता को भी बढ़ावा देती है। शिक्षा अधिकार कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को समान अवसर देना है, लेकिन हालिया बदलावों से यह लक्ष्य प्रभावित हो सकता है।