September 4, 2026

छत्तीसगढ़ में नदी संरक्षण को मिलेगा नया रोडमैप, CM साय बोले- ‘नदी बचेगी तो जल बचेगा, जल बचेगा तो जीवन बचेगा’

रायपुर। छत्तीसगढ़ की नदियों के संरक्षण और जल स्रोतों के पुनर्जीवन को लेकर राज्य सरकार ने व्यापक कार्ययोजना तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। राजधानी रायपुर में आयोजित ‘स्रोत महोत्सव 2026’ एवं राज्य स्तरीय कार्यशाला में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नदी संरक्षण को जनअभियान बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नदियां केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि प्रदेश की सभ्यता, संस्कृति, कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनधारा हैं।

मुख्यमंत्री साय ने ओमाया गार्डन में दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यशाला का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का उद्देश्य प्रदेश की नदियों के उद्गम स्थलों और जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान, संरक्षण, जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण तथा नदी पुनरुद्धार के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करना है।

पांच प्रमुख स्तंभों पर होगा नदी संरक्षण अभियान

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में नदी संरक्षण अभियान मानचित्रण, संरक्षण, पुनर्भरण, जनभागीदारी और कार्ययोजना के पांच प्रमुख स्तंभों पर आगे बढ़ेगा। प्रत्येक नदी और उसके कैचमेंट एरिया का वैज्ञानिक तरीके से मानचित्रण किया जाएगा। इसके तहत नदी के उद्गम, प्रवाह क्षेत्र, भूमि उपयोग में बदलाव और प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाले कारणों का अध्ययन किया जाएगा।

इसके आधार पर वन एवं वनस्पति संरक्षण, मृदा क्षरण रोकने, पारंपरिक जल संरचनाओं के संरक्षण और पुनर्जीवन, नई जल संग्रहण संरचनाओं तथा भू-जल पुनर्भरण जैसे कार्य किए जाएंगे।

‘नदी बचेगी तो जल बचेगा, जल बचेगा तो जीवन बचेगा’

CM साय ने कहा कि बारिश के पानी को तेजी से बहकर निकलने देने के बजाय उसे अधिक से अधिक मात्रा में जमीन के भीतर पहुंचाने की जरूरत है। इससे भू-जल स्तर में सुधार होगा और जल स्रोतों को पुनर्जीवन मिलेगा।

उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण का काम केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। नदियों के किनारे बसे गांवों और स्थानीय समुदायों को इस अभियान का प्रमुख भागीदार बनाना होगा। पंचायतों और स्थानीय समितियों के सहयोग से नदी संरक्षण के कार्यों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

जल संरक्षण के लिए दो अहम एमओयू

कार्यक्रम में जल संरक्षण और आधुनिक तकनीक के उपयोग के लिए दो महत्वपूर्ण एमओयू भी किए गए। नेशनल वाटर एकेडमी, पुणे के साथ हुए समझौते से जल संरक्षण और प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों व मैदानी अमले के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।

वहीं एंट्रिक्स कॉरपोरेशन, बेंगलुरु के साथ हुए एमओयू के तहत इसरो की विशेषज्ञता और आधुनिक भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग जल संसाधनों के वैज्ञानिक विश्लेषण और निगरानी के लिए किया जाएगा। शुरुआती चरण में कुनकुरी तहसील के करीब 1540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जल संसाधनों का अध्ययन किया जाएगा।

‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कार्यक्रम में जल संरक्षण पर आधारित ‘नीर-नारी-निधि’ पुस्तक का विमोचन भी किया। पुस्तक में जल संरक्षण, जल प्रबंधन, महिलाओं की भागीदारी और विभिन्न नवाचारों से जुड़े प्रयासों को दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

नौ नदी समूहों पर होगी विशेष चर्चा

जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो ने बताया कि कार्यशाला में प्रदेश की नदियों के नौ नदी समूहों पर अलग-अलग चर्चा की जा रही है। प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार साइट स्पेसिफिक और साइंस बेस्ड समाधान तैयार किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि नदी संरक्षण में केवल डाउनस्ट्रीम फ्लो का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। नदी के उद्गम क्षेत्र, भूमि उपयोग, मिट्टी की नमी, भू-जल रिचार्ज, वनस्पति और मृदा क्षरण सहित पूरे इकोसिस्टम को ध्यान में रखना होगा।

विशेषज्ञों ने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय पर दिया जोर

सीगंगा के संस्थापक और आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर डॉ. विनोद तारे ने कहा कि जल सुरक्षा के लिए नदियों के उद्गम और उन्हें पोषित करने वाले जल स्रोतों का संरक्षण जरूरी है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय अनुभव और आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक के बीच समन्वय को जल संरक्षण की सफलता के लिए महत्वपूर्ण बताया।

कार्यशाला में जल एवं नदी संरक्षण के विशेषज्ञों, राज्य और जिला स्तरीय समितियों के सदस्यों, कलेक्टरों और अधिकारियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम से प्राप्त सुझावों के आधार पर छत्तीसगढ़ के लिए समयबद्ध रिवर सोर्स रेस्टोरेशन रोडमैप तैयार करने की दिशा में काम किया जाएगा।