डोंगरगढ़ |
डोंगरगढ़ शहर को एक बार फिर बड़े विकास का सपना दिखाया गया है। अमृत मिशन 2.0 के तहत शहर का जियोस्पेशल मास्टर प्लान बनाया जाएगा। ड्रोन सर्वे के जरिए डाटा जुटाकर 2041 तक के विकास का खाका तैयार करने की तैयारी है। कागज़ों पर यह योजना जितनी आधुनिक और प्रभावशाली दिखती है, ज़मीनी हकीकत उतने ही गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मौजूदा योजनाएं ही धरातल पर सफल नहीं हो पाईं, तो नया मास्टर प्लान कितना कारगर साबित होगा?
वर्तमान में डोंगरगढ़ में प्रसाद योजना, शक्तिपीठ योजना और अमृत भारत स्टेशन योजना एक साथ लागू हैं। इन योजनाओं के तहत करोड़ों रुपये खर्च किए गए, निर्माण कार्य हुए और उद्घाटन भी किए गए। लेकिन हालात यह हैं कि कई सुविधाएं अधूरी हैं, कुछ शुरू होकर बंद हो चुकी हैं और कई केवल कागज़ों तक सीमित रह गई हैं।
शहर की सड़कों, नालियों, यात्री सुविधाओं और सार्वजनिक ढांचे की स्थिति अब भी सवालों के घेरे में है। स्थानीय नागरिक पूछ रहे हैं कि जब पहले से बनी व्यवस्थाओं का रखरखाव नहीं हो पाया, तो भविष्य की योजनाएं किस आधार पर टिकेंगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन सर्वे और जियोस्पेशल तकनीक अपने आप में बेहतर साधन हैं, लेकिन असल चुनौती क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही की है। जब तक योजनाओं की नियमित समीक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कोई भी मास्टर प्लान ज़मीन पर असर नहीं छोड़ पाएगा।
डोंगरगढ़ को आज एक और नई योजना से ज्यादा ज़रूरत है—पहले से स्वीकृत योजनाओं को पूरी ईमानदारी से पूरा करने की। वरना 2041 का यह मास्टर प्लान भी शहर की अधूरी परियोजनाओं की सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगा।





