डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में नवरात्रि की पंचमी पर आस्था, परंपरा और इतिहास का अद्भुत संगम देखने को मिला। आदिवासी गोंड समाज की सदियों पुरानी पंचमी भेंट यात्रा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ संपन्न हुई। इस बार यात्रा की खास बात यह रही कि समाज के लोग खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़ी राजा की प्राचीन तलवार को लेकर माता के दरबार पहुंचे।
माता बम्लेश्वरी मंदिर में उमड़ी भीड़
माँ बम्लेश्वरी मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। छोटी बम्लेश्वरी मंदिर को 601 किलो फलों से सजाया गया, जिससे मंदिर का दृश्य बेहद भव्य नजर आया। गोंड समाज के लोग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-नगाड़ों के साथ भेंट यात्रा निकालते हुए मंदिर पहुंचे।
बूढ़ादेव स्थल से निकली यात्रा
भेंट यात्रा की शुरुआत बूढ़ादेव देव स्थल से हुई, जो गोंड समाज की आस्था का प्रमुख केंद्र है। जुलूस के रूप में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे, जहां समाज के प्रतिनिधियों ने गर्भगृह में विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर माता को भेंट अर्पित की।
कड़ी सुरक्षा में शांतिपूर्ण आयोजन
पूरे आयोजन के दौरान प्रशासन की ओर से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ।
इतिहास से जुड़ी परंपरा
इस परंपरा का संबंध भोसले काल से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि डोंगरगढ़ के राजा घासीदास वैष्णव और नागपुर दरबार के बीच हुए संघर्ष के बाद उन्हें खैरागढ़ का शासन मिला। उसी समय माँ बम्लेश्वरी की प्राचीन तलवार भी उन्हें दी गई, जो आज भी राजपरिवार के पास सुरक्षित है।
आस्था और विरासत का संगम
यह पंचमी भेंट यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गोंड समाज की आस्था, परंपरा और पहचान का प्रतीक है। हर वर्ष यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का काम करता है।





