September 4, 2026

हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ की संस्कृति और कृषि परंपरा का अनूठा पर्व

रायपुर। छत्तीसगढ़ में हरेली तिहार का विशेष महत्व है। सावन माह की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व प्रदेश का प्रमुख लोकपर्व है, जो हरियाली, खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन किसान कृषि औजारों की पूजा करते हैं, पशुधन को स्नान कराकर उनकी सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं। वहीं बच्चों और युवाओं के लिए गेड़ी चढ़ना हरेली पर्व का सबसे खास आकर्षण होता है।

कृषि औजारों की होती है पूजा

हरेली के दिन किसान सुबह अपने गाय, बैल और बछड़ों को तालाब या पनघट पर नहलाते हैं। इसके बाद खेती-किसानी में इस्तेमाल होने वाले हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती, टंगिया, बसुला, सब्बल और अन्य कृषि औजारों को साफ कर घर के आंगन में पूजा के लिए सजाया जाता है। धूप-दीप से पूजा करने के बाद नारियल, गुड़हा चीला और अन्य पारंपरिक व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।

गांवों में ठाकुरदेव और अन्य ग्राम देवी-देवताओं की पूजा करने की भी परंपरा है।

पशुधन के स्वास्थ्य के लिए दी जाती है वनौषधि

हरेली पर्व पर पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए औषधीय आटे की लोंदी खिलाने की परंपरा भी है। यादव समाज के लोग वनांचल से कंद-मूल और जड़ी-बूटियां लाकर ग्रामीणों को उपलब्ध कराते हैं। कई स्थानों पर सहाड़ादेव या ठाकुरदेव के पास वनौषधियों को उबालकर किसानों को दिया जाता है। इसके बदले किसान चावल, दाल आदि देने की परंपरा निभाते हैं।

गेड़ी के बिना अधूरा है हरेली

हरेली तिहार और गेड़ी का रिश्ता बेहद पुराना है। ग्रामीण इलाकों में इस पर्व से पहले बढ़ई के घर गेड़ी बनाने के ऑर्डर मिलने लगते थे। बच्चे और युवा हरेली के दिन सुबह से ही गेड़ी चढ़कर उत्सव का आनंद लेते हैं।

गेड़ी आमतौर पर बांस से तैयार की जाती है। दो लंबे बांस में बराबर दूरी पर कील लगाकर पैर रखने के लिए पउआ लगाए जाते हैं। गेड़ी पर चलते समय निकलने वाली रच-रच की आवाज हरेली के उत्सव को और खास बना देती है।

नीम की डाली और चौखट में कील लगाने की परंपरा

हरेली के दिन गांवों में पौनी-पसारी जैसे राऊत और बैगा घर-घर जाकर दरवाजे पर नीम की डाली खोंचते हैं। वहीं लोहार द्वारा अनिष्ट की आशंका को दूर करने के लिए घर की चौखट में कील लगाने की परंपरा भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी देखने को मिलती है।

छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की खुशबू से महकते हैं घर

हरेली के दिन घरों में तरह-तरह के पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाए जाते हैं। गुलगुल भजिया, गुड़हा चीला समेत कई पकवान तैयार कर कृषि औजारों की पूजा के बाद उनका भोग लगाया जाता है।

खेल-कूद और झूले का भी रहता है उत्साह

शाम के समय गांवों में बच्चे और युवा नारियल फेंकने, कबड्डी समेत कई पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेते हैं। बहू-बेटियां नए कपड़े पहनकर सावन झूला, बिल्लस, खो-खो और फुगड़ी जैसे खेलों का आनंद लेती हैं।

हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के कृषि जीवन, लोक परंपराओं, प्रकृति और सामुदायिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यही वजह है कि आज भी गांवों में हरेली तिहार पूरे उत्साह और पारंपरिक रंग-रूप के साथ मनाया जाता है।