बंद मुठ्ठी की सत्ता
पिछले हफ्ते ‘पावर सेंटर’ में आईएएस और आईपीएस अफसरों के बीच वर्चस्व की जो लड़ाई चर्चा में आई, वह सिर्फ हवा में नहीं थी। कई अफसरों ने इस स्तंभ में रोशनी डाली कि आईपीएस बिरादरी अपनी भूमिका और अधिकार क्षेत्र को लेकर पुराने समय से शिकायत करती रही है।
आईपीएस अपने क्षेत्र में आईएएस का दखल मानते हैं, लेकिन आईएएस की टेरिटरी में आईपीएस की मौजूदगी अब भी केवल अस्थायी मानी जाती है। जैसे कोई प्रयोग। कई पदों पर आईएएस ने धीरे-धीरे कब्जा जमा लिया और दूसरी सर्विसेज के लिए जगह सिमटती चली गई।
पूर्ववर्ती और वर्तमान सरकारों में कई आईपीएस अफसरों ने महत्वपूर्ण ओहदे संभाले हैं—डीजी, एडीजी, जनसंपर्क आयुक्त और सचिवालय में ताकतवर पद। लेकिन ये अपवाद हैं, स्थायी व्यवस्था नहीं। रायपुर कमिश्नरेट विवाद ने इस असहज सच्चाई को और उजागर किया कि सत्ता के असली फैसले अक्सर आईएएस अफसरों के पक्ष में होते हैं।
जूतमपैजार और संगठन का बिखराव
आईएएस की बंद मुठ्ठी संगठन की एकजुटता और शक्ति का प्रतीक है। उदाहरण के तौर पर, एक दशक पहले एसीबी ने रिश्वत लेते आईएएस को पकड़ा था, लेकिन आईएएस एसोसिएशन ने सत्ता केंद्र तक की घेराबंदी कर कार्रवाई को टाल दिया।
इसके विपरीत, आईपीएस अफसरों की मुठ्ठी खुली हुई है। कई खेमों में बंटे अफसर अपने ही कैडर के खिलाफ मोर्चा लिए खड़े हैं। इसी वजह से संगठनात्मक कमजोरी और बिखराव साफ नजर आता है।
विकेट गिरना तय
एक विभागीय टेंडर विवाद में सेक्रेटरी और डायरेक्टर आमने-सामने हैं। सेक्रेटरी ने अपने चहेते को काम दिलाने की कोशिश की और दस प्रतिशत कमीशन की भी बात रखी। डायरेक्टर ने नियमों के अनुसार जवाब दिया। इस लड़ाई में किसी एक पद का गिरना लगभग तय माना जा रहा है।
एसपी की पीड़ा और प्रशासनिक तंत्र
कवर्धा के एसपी धमेंद्र छवई ने प्रमोशन नहीं मिलने की पीड़ा खुलकर व्यक्त की। उन्होंने अपनी शिकायत सीधे सत्ता के दरवाजे पर रखी। यह साहस या दुस्साहस का उदाहरण माना जा सकता है। प्रशासन के वरिष्ठ अफसर इस स्थिति को कैसे संभालें, यह अभी तय नहीं हुआ।
इलेक्शन कैडर और चुनावी ड्यूटी
छत्तीसगढ़ से 25 आईएएस और 5 आईपीएस अफसरों को पांच राज्यों के चुनाव के लिए भेजा गया। आईपीएस में एक एडीजी और चार आईजी शामिल हैं। बार-बार चुनावी ड्यूटी पर भेजे जाने वाले अफसर अब “इलेक्शन कैडर” का हिस्सा माने जाते हैं। यह सूची राज्य सरकार की सिफारिश और चुनाव आयोग की मंजूरी से तय होती है।
बार-बार वही अफसर चुनावी ड्यूटी पर जाने के कारण अब विभागीय काम से ज्यादा चुनावी काम के लिए पहचाने जाने लगे हैं।
गणतंत्र दिवस का मंच और लोकतंत्र का खेल
मुख्य समारोह में एक नेता ने अपने करीबी आदमी को आयोजन की जिम्मेदारी देने की मांग की। प्रशासन ने नियम पीछे हटाकर नेता के आदमी को जिम्मेदारी दे दी। यह दिखाता है कि लोकतंत्र का उत्सव कई बार औपचारिकता में ही रह जाता है जब सत्ता और निजी हित तंत्र पर हावी हो।
निष्कर्ष: बंद मुठ्ठी बनाम खुली मुट्ठी
आईएएस की बंद मुठ्ठी संगठन की ताकत, एकजुटता और प्रभाव का प्रतीक है। जबकि आईपीएस की खुली मुट्ठी बिखराव, आंतरिक संघर्ष और कमजोरी की ओर इशारा करती है। चुनावी ड्यूटी, विभागीय फेरबदल और पदों की सीमा इस सत्ता संघर्ष को लगातार जिंदा रखती हैं।
राज्य के ब्यूरोक्रेटिक अरेंजमेंट में यह संघर्ष असली चेहरा दिखाता है: आईएएस अफसरों का संगठन और ताकत मजबूत है, आईपीएस अफसरों के लिए चुनौती बनी हुई है।





