नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में 20% तक बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में ईंधन महंगाई आम लोगों पर भारी पड़ रही है।
इसके विपरीत, भारत में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं। मुंबई जैसे महानगर में कीमतें करीब 103 रुपये प्रति लीटर के आसपास टिकी हुई हैं।
‘प्रॉफिट बफर’ फॉर्मूला कैसे काम करता है?
भारत में कीमतों की स्थिरता का बड़ा कारण सरकारी तेल कंपनियों—IOCL, BPCL और HPCL—की रणनीति है।
जब कच्चे तेल की कीमतें कम होती हैं, तब ये कंपनियां अधिक मुनाफा कमाकर एक रिजर्व तैयार करती हैं। बाद में जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, तो उसी “प्रॉफिट बफर” का इस्तेमाल कर कीमतों को स्थिर रखा जाता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
मदन सबनवीस के अनुसार, भारतीय तेल कंपनियां फिलहाल मुनाफे का हिस्सा छोड़कर उपभोक्ताओं को राहत दे रही हैं। इससे महंगाई में अचानक उछाल आने से रोका जा रहा है।
कब बढ़ सकती हैं कीमतें?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत तब तक संभव है जब तक कच्चे तेल की कीमत $100 प्रति बैरल से नीचे बनी रहती है।
- $100 के ऊपर जाने पर कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा
- $110 पार होने पर कीमतें बढ़ने की संभावना काफी अधिक हो जाएगी
टैक्स भी निभाता है बड़ी भूमिका
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमत का 40-50% हिस्सा टैक्स होता है। ऐसे में सरकार के पास कीमतों को नियंत्रित करने के लिए एक्साइज ड्यूटी कम करने का विकल्प मौजूद रहता है।
साथ ही डीलर कमीशन (₹2–₹4 प्रति लीटर) भी कीमत निर्धारण का हिस्सा होता है।
रणनीतिक भंडार से भी मिल रही राहत
भारत ने हाल के वर्षों में अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Reserves) को मजबूत किया है, जिससे आपूर्ति में बाधा आने पर भी कुछ समय तक स्थिति संभाली जा सकती है।
आगे क्या?
हालांकि, भारत अपनी लगभग 85% तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो सरकार के सामने दो ही विकल्प होंगे:
- सब्सिडी देकर कंपनियों का नुकसान कम करना
- या फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाना
फिलहाल भारत में स्थिर ईंधन कीमतें तेल कंपनियों की रणनीति, टैक्स संरचना और सरकारी हस्तक्षेप का परिणाम हैं। लेकिन यह संतुलन लंबे समय तक बना रहेगा या नहीं, यह पूरी तरह वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगा।





