March 5, 2026

नक्सलवाद के खात्मे के बाद विकास की मांग, 18 पंचायतों के 68 गांवों ने किया चक्काजाम

कांकेर।
एक समय अतिसंवेदनशील माने जाने वाले कोयलीबेड़ा इलाके में जहां नक्सलवाद के कारण विकास की रफ्तार थमी हुई थी, वहीं अब नक्सल प्रभाव कम होते ही लोग बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। कोयलीबेड़ा क्षेत्र के 18 ग्राम पंचायतों के 68 गांवों के ग्रामीणों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंक और प्रशासनिक कार्यालयों सहित अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर चक्काजाम व धरना प्रदर्शन किया।

कांकेर जिले का कोयलीबेड़ा इलाका लंबे समय तक नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित और अतिसंवेदनशील क्षेत्र रहा है। नक्सलियों की दहशत के चलते अंदरूनी गांवों में विकास कार्य ठप पड़े थे। सरकार द्वारा चलाए जा रहे नक्सल उन्मूलन अभियान के बाद अब क्षेत्र में शांति लौट रही है, जिससे ग्रामीणों की वर्षों से दबी उम्मीदें फिर जाग उठी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब अब नक्सलवाद अंतिम सांसें गिन रहा है, तो उन्हें विकास से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए।

ब्लॉक मुख्यालय में नहीं बैठते अधिकारी

ग्रामीणों का आरोप है कि कोयलीबेड़ा ब्लॉक मुख्यालय होने के बावजूद अधिकांश विभागों के अधिकारी यहां नहीं बैठते। सभी कार्यालय और अधिकारी लगभग 50 किलोमीटर दूर पखांजूर में संचालित हो रहे हैं, जिससे क्षेत्र के ग्रामीणों को हर छोटे काम के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। बार-बार मांग करने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।

महाविद्यालय और शिक्षा की भारी कमी

ग्रामीणों ने बताया कि क्षेत्र के स्कूलों की हालत जर्जर है और महाविद्यालय की मांग वर्षों से लंबित है। बारहवीं के बाद बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए 50 किलोमीटर दूर भानुप्रतापपुर जाना पड़ता है। कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते कई बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं।

स्वास्थ्य सुविधाएं सिर्फ कागजों में

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र में केवल नाम मात्र की सुविधाएं हैं। एक एम्बुलेंस, महिला डॉक्टर, अन्य चिकित्सकों और जरूरी उपकरणों की भारी कमी के कारण मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।

धान का भुगतान लेने 50 किमी की दूरी

कोयलीबेड़ा क्षेत्र के अधिकांश लोग कृषि पर निर्भर हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सरकारी योजनाओं के तहत उपज बेचने के बावजूद धान का भुगतान लेने के लिए 50 किलोमीटर दूर भानुप्रतापपुर जाना पड़ता है, वह भी सप्ताह में सिर्फ एक दिन बुधवार को। कई बार भुगतान नहीं मिलने पर किसानों को खाली हाथ लौटना पड़ता है। लंबे समय से सहकारी बैंक खोलने की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक कोई पहल नहीं हुई है।

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी पांच सूत्रीय जायज मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले समय में वे उग्र आंदोलन करने को मजबूर होंगे।