खैरागढ़।
शहर के बहुचर्चित एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और नजूल भूमि से जुड़ा विवाद अब एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। करीब 85 हजार वर्गफीट जमीन और 40 करोड़ रुपए से अधिक की अनुमानित कीमत वाले इस मामले ने प्रशासन और राजस्व रिकॉर्ड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विवाद बढ़ने के बाद अब प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने भी मामले की जांच के संकेत दिए हैं।

1974 की रजिस्ट्री से शुरू हुआ पूरा विवाद
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार यह मामला वर्ष 1974 की एक रजिस्ट्री से जुड़ा है। उस समय प्लॉट नंबर 114 और 115 की रजिस्ट्री अवयस्क स्मृति सिंह के नाम दर्ज की गई थी। दस्तावेजों में इन भूखंडों का उल्लेख “एडवर्ड पार्क” और “बाड़ी एडवर्ड पार्क” के रूप में किया गया है।
रजिस्ट्री में तत्कालीन राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह को विक्रेता के रूप में दर्ज बताया गया है, जबकि आम मुख्तियार के रूप में रविंद्र बहादुर सिंह के हस्ताक्षर पाए जाते हैं। वहीं क्रेता पक्ष में अवयस्क स्मृति सिंह की ओर से उनकी माता एवं संरक्षिका रश्मि देवी सिंह का नाम दर्ज है। उस समय इस भूमि की कीमत मात्र 3 हजार रुपए दर्शाई गई थी।
सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और सार्वजनिक भूमि का उल्लेख
विवाद का सबसे बड़ा पहलू सरकारी अभिलेखों से जुड़ा हुआ है। राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार खसरा नंबर 167, 169 और 170 में यह भूमि सड़क, रास्ता, घास भूमि और छोटे झाड़ के जंगल के रूप में दर्ज बताई जाती है।
इसके अलावा नजूल मेंटेनेंस रिकॉर्ड में प्लॉट नंबर 114 को “एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” और प्लॉट नंबर 115 को “बाड़ी एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क” के रूप में दर्ज किया गया है।
इसी आधार पर सवाल उठ रहे हैं कि यदि भूमि वास्तव में सार्वजनिक उपयोग या पार्क श्रेणी की थी, तो इसका भूमि उपयोग परिवर्तन कब और किस प्रक्रिया के तहत किया गया। अभी तक इससे जुड़ा कोई स्पष्ट और सार्वजनिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया है।
22 हिस्सों में प्लॉटिंग, 40 करोड़ से अधिक मूल्य का अनुमान
संयुक्त जांच प्रतिवेदन के अनुसार लगभग 85,627 वर्गफीट भूमि को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर कुल 22 प्लॉट बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। इन प्लॉटों की बिक्री भी विभिन्न लोगों को किए जाने का उल्लेख किया गया है।
वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार इस पूरी जमीन की कीमत 40 करोड़ रुपए से अधिक आंकी जा रही है। इसी वजह से यह मामला अब केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर कथित प्लॉटिंग और सार्वजनिक भूमि उपयोग से जुड़ा गंभीर प्रकरण बन गया है।
पहले भी विधानसभा तक पहुंच चुका है मामला
यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2020 में तत्कालीन विधायक और राजपरिवार के सदस्य स्वर्गीय देवव्रत सिंह ने विधानसभा में इस क्षेत्र में कथित अवैध प्लॉटिंग का मुद्दा उठाया था।
इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच भी हुई थी और कुछ भूखंडों को अवैध प्लॉटिंग की श्रेणी में चिन्हित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। कुछ मामलों में रजिस्ट्री पर रोक लगाने की कार्रवाई भी की गई थी।
छोटे अतिक्रमण पर सख्ती, बड़े मामलों पर सवाल
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक कार्रवाई की प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों में यह चर्चा तेज है कि जहां छोटे अतिक्रमणों पर तुरंत कार्रवाई होती है, वहीं बड़े और प्रभावशाली मामलों में कार्रवाई की गति धीमी क्यों रहती है।
लोगों का कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट में गंभीर सवाल मौजूद हैं, तो अब तक कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
भूमिस्वामी पक्ष का दावा
भूमि स्वामी पक्ष के प्रतिनिधि रजत भार्गव ने दावा किया है कि उनके पास 1974 की विधिवत पंजीकृत रजिस्ट्री, सीमांकन प्रतिवेदन और राजस्व अभिलेख उपलब्ध हैं। उनके अनुसार यह भूमि वर्षों से उनकी पत्नी स्मृति भार्गव के नाम दर्ज है और समय-समय पर इसका सीमांकन भी किया गया है।
उन्होंने कहा कि सभी दस्तावेज शासन या प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किए जा सकते हैं और बिना पूर्ण जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
प्रभारी मंत्री ने दिए जांच के संकेत
मामले को लेकर प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने कहा है कि वे कलेक्टर से चर्चा करेंगे और पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि नियमों का उल्लंघन पाया गया तो नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।
नजर अब प्रशासनिक जांच पर
एक तरफ 52 साल पुरानी रजिस्ट्री, दूसरी तरफ सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और सार्वजनिक भूमि का उल्लेख। एक ओर निजी स्वामित्व का दावा, तो दूसरी ओर करोड़ों की कथित प्लॉटिंग और राजस्व रिकॉर्ड पर उठते सवाल।
पूरा मामला अब प्रशासनिक जांच के केंद्र में है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और प्रशासन इस विवाद को किस दिशा में ले जाते हैं और क्या यह मामला किसी बड़े भूमि घोटाले की परतें खोलता है या फिर दस्तावेजी विवाद के रूप में ही सीमित रहता है।





