July 23, 2026

खैरागढ़ में सरकारी जमीन घोटाले की जांच तेज, पार्क-जंगल की भूमि पर करोड़ों की प्लॉटिंग का खुलासा, राजस्व रिकॉर्ड और रजिस्ट्री व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

खैरागढ़। खैरागढ़ में सरकारी जमीनों की कथित प्लॉटिंग और बिक्री का मामला सामने आने के बाद राजस्व व्यवस्था और भूमि रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जिन जमीनों को सरकारी दस्तावेजों में एडवर्ड पार्क, छोटे झाड़ का जंगल और सार्वजनिक उपयोग की भूमि बताया गया था, उन्हीं जमीनों को प्लॉट में तब्दील कर करोड़ों रुपये में बेचा गया।

जानकारी के अनुसार, मामला खसरा नंबर 114, 115, 169 और 170 से जुड़ा हुआ है। संयुक्त जांच प्रतिवेदन में इन जमीनों के स्वरूप और स्वामित्व को लेकर कई गंभीर अनियमितताओं की ओर संकेत किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज भूमि का उपयोग और वास्तविक स्थिति में बड़ा अंतर पाया गया है।

जमीन की कीमतों में कई गुना उछाल

सूत्रों के अनुसार, संबंधित जमीनों के हिस्से पहले दो से तीन हजार रुपये प्रति वर्गफीट की दर से बेचे गए। बाद में बिचौलियों के माध्यम से यही जमीन सात से आठ हजार रुपये प्रति वर्गफीट तक पहुंच गई। इस दौरान करोड़ों रुपये का कारोबार हुआ, जबकि भूमि के मूल स्वरूप को लेकर सवाल लगातार बने रहे।

मेंटेनेंस खसरे से शुरू हुआ खेल

जानकारी के मुताबिक, रियासतकालीन रिकॉर्ड तैयार होने के दौरान कई जमीनों का प्रकार सरकारी, सार्वजनिक उपयोग या जंगल मद में दर्ज किया गया था। हालांकि मेंटेनेंस खसरों के स्वामित्व कॉलम में तत्कालीन राजपरिवार के नाम बने रहे। समय के साथ इसी प्रविष्टि का उपयोग मालिकाना हक के आधार के रूप में किया जाने लगा और भूमि की खरीदी-बिक्री का सिलसिला शुरू हो गया।

कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल मेंटेनेंस खसरे में नाम दर्ज होने से पूर्ण स्वामित्व सिद्ध नहीं होता। कई न्यायिक टिप्पणियों में भी स्पष्ट किया गया है कि राजस्व रिकॉर्ड या खसरा प्रविष्टियां मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं मानी जातीं।

बिना स्वीकृत ले-आउट के हुआ भूमि विभाजन

नगर एवं ग्राम निवेश विभाग ने भी स्पष्ट किया है कि संबंधित भूमि का कोई स्वीकृत ले-आउट नहीं था। जांच में बिना अनुमति भूमि विभाजन और उपविभाजन किए जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद रजिस्ट्रियां होती रहीं, नामांतरण हुए और निर्माण कार्य भी जारी रहे।

शासन स्तर तक पहुंचा मामला

मामला अब शासन स्तर तक पहुंच गया है। राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा है कि शिकायत और जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराए जाने पर पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि जांच में अनियमितता सामने आई है तो यह भी देखा जाएगा कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

कई विभागों की भूमिका पर सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि छोटे मामलों में राजस्व और वन नियमों का हवाला देकर निर्माण कार्य रोक दिए जाते हैं, लेकिन करोड़ों रुपये की जमीनों पर वर्षों तक प्लॉटिंग, रजिस्ट्री और निर्माण कार्य चलते रहे। ऐसे में अब सवाल केवल जमीन बेचने वालों पर नहीं, बल्कि उन विभागों पर भी उठ रहे हैं जिनकी निगरानी में यह पूरा मामला चलता रहा।

फिलहाल जांच जारी है। मामले की अगली कार्रवाई और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।