रायपुर |
छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना का बड़ा आधार खेती और किसान हैं। राज्य के लाखों किसान दशकों से सिंचाई के लिए परंपरागत नहर प्रणाली पर निर्भर रहे हैं। यह व्यवस्था अपने समय में उपयोगी रही, लेकिन बदलते मौसम, जल संकट, बढ़ती आबादी और बढ़ती कृषि लागत के दौर में इसकी सीमाएं अब साफ तौर पर सामने आ चुकी हैं।
ऐसे समय में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय द्वारा परंपरागत नहर आधारित सिंचाई के स्थान पर प्रेशर इरिगेशन नेटवर्क (PIN) को अपनाने का निर्णय छत्तीसगढ़ की कृषि व्यवस्था को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है। यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, लागत नियंत्रण और किसान आय बढ़ाने की समग्र रणनीति है।
क्या है प्रेशर इरिगेशन नेटवर्क (PIN)?
प्रेशर इरिगेशन नेटवर्क के तहत पाइपलाइन के माध्यम से दबाव के साथ खेतों तक पानी पहुंचाया जाता है। इससे पानी की बर्बादी रुकती है और टपक सिंचाई (ड्रिप) व स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक प्रणालियों को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है।
परंपरागत नहर प्रणाली की सीमाएं
नहरों के जरिए सिंचाई में पानी का बड़ा हिस्सा रिसाव और वाष्पीकरण में नष्ट हो जाता है। साथ ही, अंतिम छोर के किसानों तक पानी पहुंचने में असमानता रहती है। रखरखाव की लागत अधिक होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते।
PIN से किसानों को क्या फायदा?
- 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत
- बिजली और डीजल खर्च में कमी
- खेत के अनुसार नियंत्रित सिंचाई
- फसल उत्पादकता में वृद्धि
- किसान की आय में स्थायी सुधार
विशेषज्ञों का मानना है कि PIN प्रणाली से राज्य में धान के साथ-साथ दलहन, तिलहन और सब्जी उत्पादन को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे फसल विविधीकरण संभव हो सकेगा।
सरकार की विकासोन्मुख सोच
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का यह निर्णय दर्शाता है कि सरकार अल्पकालिक लाभ की बजाय दीर्घकालिक कृषि सुधार की दिशा में काम कर रही है। जल संरक्षण और आधुनिक सिंचाई को प्राथमिकता देकर राज्य को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा रहा है।
राजनीतिक और कृषि विशेषज्ञों की राय में यदि यह योजना समयबद्ध, पारदर्शी और किसान-केंद्रित तरीके से लागू होती है, तो छत्तीसगढ़ की खेती न केवल आत्मनिर्भर बनेगी, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति में भी ठोस सुधार देखने को मिलेगा।
कुल मिलाकर, प्रेशर इरिगेशन नेटवर्क छत्तीसगढ़ के कृषि परिदृश्य में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है—जहां पानी की हर बूंद का सही उपयोग होगा और किसान की मेहनत को बेहतर मूल्य मिलेगा।





