January 16, 2026

बस्तर में सरकारी लापरवाही से सड़ रहा किसानों का धान, 27 हजार मीट्रिक टन अब भी संग्रहण केंद्रों में

जगदलपुर। किसानों की कड़ी मेहनत से उपजा धान बारिश और सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ गया है। बस्तर जिले में खरीदी के लगभग एक साल बाद भी 27,307 मीट्रिक टन धान अब तक संग्रहण केंद्रों में पड़ा हुआ है, जिसका समय पर उठाव नहीं हो सका। नतीजतन, करोड़ों रुपये का धान सड़ने लगा है। हालात केवल बस्तर तक सीमित नहीं हैं—कवर्धा में 7 करोड़ का धान चूहों द्वारा नष्ट होने और दंतेवाड़ा में बड़ी मात्रा में चावल खराब होने के मामले पहले ही सामने आ चुके हैं।

नियानार केंद्र में सड़ते धान के ढेर

संग्रहण केंद्र के गेट में प्रवेश करते ही काले पड़ चुके सड़े धान के ढेर नजर आए। यह किसी किस्म का नया धान नहीं, बल्कि पूरी तरह खराब हो चुका धान है। स्थिति इतनी खराब है कि धान के साथ-साथ बारदाने (बोरे) भी गल चुके हैं। अब मिलर्स सड़े बोरों से धान निकालकर नए बोरों में भरकर उठाव कर रहे हैं।

उठाव की अंतिम तिथि 31 जनवरी तय की गई है, लेकिन नियानार केंद्र में रखे 15,129 मीट्रिक टन धान का समय पर उठाव होना मुश्किल नजर आ रहा है। सड़े बारदानों को अलग कर धान को नए बोरो में पैक किया जा रहा है। यहां तक कि केंद्र के मुंशी द्वारा मजदूरों को अच्छा और खराब धान मिलाकर बोरे भरने के निर्देश देने की बात भी सामने आई है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

यह पहली बार नहीं है जब बस्तर संभाग में धान या चावल खराब हुआ हो। हाल ही में दंतेवाड़ा जिले में 30 हजार क्विंटल चावल खराब मिलने से कई हितग्राही राशन से वंचित रह गए थे। आशंका जताई जा रही है कि यही खराब धान मिलर्स द्वारा चावल में बदलकर सरकार को सौंप दिया जाएगा। फफूंद लगे धान से निकला चावल स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

मिलर्स प्रतिनिधि का आरोप

मामले पर जब जिला विपणन अधिकारी से बातचीत की कोशिश की गई, तो उन्होंने इंटरव्यू देने से इनकार करते हुए केवल डेटा उपलब्ध कराने की बात कही। वहीं संग्रहण केंद्र में मौजूद मिलर्स प्रतिनिधि ने इसे सीधे तौर पर शासन-प्रशासन की लापरवाही बताया। उनका कहना था कि समय पर डीओ (डिलीवरी ऑर्डर) जारी नहीं होने के कारण धान का उठाव नहीं हो सका, जबकि बारिश से पहले यह प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए थी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि धान को ढकने के लिए इस्तेमाल की गई घटिया गुणवत्ता की त्रिपाल भी धान खराब होने का बड़ा कारण बनी। मिलर्स प्रतिनिधि ने स्पष्ट कहा कि इस धान से निकला चावल राशन दुकानों में वितरण योग्य नहीं है।

मजदूर संघ ने भी जताई चिंता

संग्रहण केंद्र में कार्यरत मजदूर संघ का कहना है कि नियानार केंद्र में इतनी बड़ी मात्रा में धान का खराब होना पहली बार देखा गया है। उनका आरोप है कि शासन-प्रशासन की सीधी लापरवाही से किसानों की मेहनत बर्बाद हो गई। मजदूरों ने आशंका जताई कि यही खराब धान से बना चावल अंततः आम लोगों की थाली तक पहुंचेगा, जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है।

अपर कलेक्टर ने मानी खराबी, जांच के दिए संकेत

मामले की गंभीरता को देखते हुए निरीक्षण पर पहुंचे अपर कलेक्टर सीपी बघेल ने स्वीकार किया कि धान खराब हुआ है। उन्होंने बताया कि वे यह जांचने आए हैं कि धान की नियमित पलटी हो रही है या नहीं। उनका कहना था कि सड़े बोरों से धान निकालकर अच्छे बोरों में शिफ्ट किया जा रहा है, लेकिन वे स्वयं भी आश्वस्त नहीं हैं कि इससे बना चावल खाने योग्य होगा।
अपर कलेक्टर ने कहा कि भौतिक सत्यापन के लिए जांच टीम गठित की जाएगी, जो यह तय करेगी कि इतनी बड़ी मात्रा में धान खराब होने की जिम्मेदारी किसकी है।

कांग्रेस का आरोप—निष्पक्ष जांच से उजागर होगा बड़ा घोटाला

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि यह स्थिति केवल नियानार संग्रहण केंद्र तक सीमित नहीं है। उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री के गृह जिले में भी 6 करोड़ रुपये का धान खराब हुआ है, कवर्धा में 7 करोड़ और दंतेवाड़ा में 18 करोड़ रुपये के चावल के खराब होने के मामले सामने आ चुके हैं।
बैज ने सवाल उठाया कि यह वास्तव में चूहों और बारिश की वजह है या फिर एक बड़ा घोटाला। उन्होंने कहा कि यदि प्रदेशभर के संग्रहण केंद्रों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो करोड़ों रुपये के घोटाले उजागर हो सकते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है, लेकिन यदि हर साल किसानों का धान इसी तरह सड़ता रहा, तो इसकी कीमत किसान से लेकर आम उपभोक्ता तक सभी को चुकानी पड़ेगी।