July 29, 2026

NEET संकट ने उठाए बड़े सवाल, क्या सिर्फ ऑनलाइन परीक्षा से लौटेगा भरोसा?

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने शुक्रवार को NEET-UG 2026 परीक्षा रद्द करने और 21 जून को पुनर्परीक्षा कराने की घोषणा की। इसके साथ ही सरकार ने अगले वर्ष से परीक्षा को पूरी तरह कंप्यूटर आधारित प्रणाली (CBT Mode) में आयोजित करने की बात कही है। सरकार का दावा है कि इससे पेपर लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी और परीक्षा प्रक्रिया अधिक सुरक्षित व पारदर्शी बनेगी।

हालांकि, इस फैसले के बाद छात्रों, अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों के बीच कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल परीक्षा का माध्यम बदल देने से परीक्षा प्रणाली पूरी तरह भरोसेमंद हो जाएगी?

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली लगातार विवादों में रही है। कभी पेपर लीक, कभी ग्रेस मार्क्स, कभी रिजल्ट विवाद और कभी तकनीकी गड़बड़ियों को लेकर एजेंसी पर सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2024 में NEET परीक्षा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया था। लाखों छात्र दोबारा परीक्षा की मांग कर रहे थे, जबकि काउंसलिंग प्रक्रिया जारी रही। इससे छात्रों में असमंजस और मानसिक दबाव की स्थिति बनी रही।

2025 में भी कई परीक्षा केंद्रों पर तकनीकी और प्रशासनिक अव्यवस्था की शिकायतें सामने आईं। कहीं प्रश्नपत्र देर से पहुंचे तो कहीं परीक्षा समय पर शुरू नहीं हो सकी। अब 2026 में परीक्षा रद्द होने की स्थिति ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सरकार ने समाधान के रूप में कंप्यूटर आधारित परीक्षा का प्रस्ताव रखा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन परीक्षा प्रणाली भी पूरी तरह विवादमुक्त नहीं रही है। NTA पहले से ही JEE और NET जैसी परीक्षाएं ऑनलाइन माध्यम में आयोजित करती है, जहां सर्वर डाउन, तकनीकी खराबी, अलग-अलग शिफ्ट में प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर में अंतर और परीक्षा केंद्रों की समस्याओं को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं।

इसी को लेकर छात्रों और अभिभावकों के मन में कई चिंताएं हैं। यदि परीक्षा के दौरान कंप्यूटर खराब हो जाए या इंटरनेट बाधित हो जाए तो जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को महानगरों जैसी तकनीकी सुविधाएं मिल पाएंगी? क्या अलग-अलग शिफ्ट में होने वाली परीक्षाओं में प्रश्नपत्रों का स्तर समान रखा जा सकेगा?

विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल तकनीक की नहीं, बल्कि भरोसे की है। हर बार परीक्षा रद्द होने या विवाद होने का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ता है। उन्हें दोबारा तैयारी करनी पड़ती है, मानसिक तनाव झेलना पड़ता है और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति में रहना पड़ता है। वहीं अभिभावकों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ता है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल नई घोषणाओं या तात्कालिक सुधारों से काम नहीं चलेगा। परीक्षा प्रणाली में संस्थागत सुधार, पारदर्शिता, स्वतंत्र निगरानी और स्पष्ट जवाबदेही तय करना जरूरी हो गया है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर मूल्यांकन तक की पूरी प्रक्रिया को मजबूत और विश्वसनीय बनाना समय की मांग है।

भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है और करोड़ों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए अपने भविष्य की उम्मीदें जोड़ते हैं। ऐसे में परीक्षा प्रणाली पर लगातार उठते सवाल केवल शिक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे के लिए भी बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।