जगदलपुर/नारायणपुर। अबूझमाड़ का रेकावाया गांव अब सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि बदलते बस्तर और नक्सलमुक्त भारत की जीवंत मिसाल बनकर उभरा है। घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसा यह गांव कभी नक्सलियों का गढ़ माना जाता था, जहां पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती थी।
नारायणपुर मुख्यालय से करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में कभी शासन-प्रशासन की पहुंच लगभग नहीं थी। यहां न सड़क थी, न संचार सुविधा और न ही शासकीय योजनाओं का लाभ। ग्रामीण दशकों तक नक्सलियों के भय में जीते रहे, जहां शिक्षा के नाम पर बच्चों को किताबों की जगह बंदूक की भाषा सिखाई जाती थी।

नक्सल प्रभाव से विकास की ओर बदलाव
केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त रणनीति, लगातार एंटी-नक्सल अभियानों और सुरक्षा बलों की सक्रियता से रेकावाया की तस्वीर बदलनी शुरू हुई। पुलिस कैंप स्थापित हुए, सुरक्षा बढ़ी और पहली बार गांव तक सड़क पहुंची, जिसने विकास के दरवाजे खोल दिए।

सुशासन एक्सप्रेस बनी बदलाव की कड़ी
प्रशासन ने “सुशासन एक्सप्रेस” के जरिए शासन को गांव तक पहुंचाया। अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस इस मोबाइल यूनिट के माध्यम से आधार कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, आय-जाति प्रमाण पत्र सहित 27 प्रकार के दस्तावेज गांव में ही बनाए जा रहे हैं। अब तक 14 हजार से अधिक आवेदनों का निराकरण किया जा चुका है।
पहचान और अधिकार मिले ग्रामीणों को
पहले जहां ग्रामीणों के पास बुनियादी दस्तावेज भी नहीं थे, वहीं अब वे शासन की योजनाओं का लाभ ले पा रहे हैं। नक्सलियों के डर से जो लोग बाहर नहीं निकल पाते थे, अब वे स्वतंत्र रूप से आवाजाही कर रहे हैं।

शिक्षा में सबसे बड़ा बदलाव
जहां कभी नक्सलियों का ‘जनताना सरकार स्कूल’ चलता था, वहीं अब शासकीय छात्रावास और स्कूल संचालित हो रहे हैं। प्रशासन ने 10 स्कूल दोबारा शुरू किए और 24 नए स्कूल खोले हैं, जिनमें 700 से अधिक बच्चों का दाखिला हुआ है। 42 आंगनबाड़ी केंद्रों से 1000 से ज्यादा बच्चे जुड़े हैं।
सड़क, नेटवर्क और नई उम्मीदें
गांव तक सड़क पहुंचने के साथ अब राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण और मोबाइल-इंटरनेट कनेक्टिविटी पर भी काम जारी है। जल, राशन और बैंकिंग सुविधाएं भी धीरे-धीरे पहुंच रही हैं।

ग्रामीणों की बदली जिंदगी
ग्रामीणों का कहना है कि पहले उन्हें हर गतिविधि के लिए नक्सलियों से अनुमति लेनी पड़ती थी। अब वे स्वतंत्र हैं, गांव में ही राशन, स्कूल और दस्तावेज जैसी सुविधाएं मिल रही हैं। कई लोग पहली बार शहर तक पहुंचे हैं।
सरेंडर कर मुख्यधारा में लौटे युवा
आत्मसमर्पण कर चुके नक्सली भी अब सामान्य जीवन जी रहे हैं। उन्हें पुनर्वास, प्रशिक्षण और पहचान मिल रही है। गांव में विकास कार्यों को देखकर वे भी बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं।
रेकावाया आज उस बदलाव की कहानी कह रहा है, जहां डर की जगह विश्वास ने ले ली है। यह गांव अब सिर्फ नक्सलमुक्त नहीं, बल्कि विकास और सुशासन की नई पहचान बन चुका है।






