May 14, 2026

ताड़मेटला नक्सली हमला केस: हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज की, सभी आरोपी बरी बरकरार

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि इतने गंभीर मामले में भी अभियोजन पक्ष कोई कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिसके चलते आरोपियों को संदेह से परे दोषी साबित नहीं किया जा सका।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अत्यंत दुखद है कि बड़े पैमाने पर जवानों की शहादत और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामले का अंत इस प्रकार हुआ, जहां जांच और साक्ष्य दोनों कमजोर साबित हुए।

यह मामला 6 अप्रैल 2010 को सुकमा जिले के ताड़मेटला जंगल में हुए नक्सली हमले से जुड़ा है, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे। उस दौरान सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन एरिया डोमिनेशन पेट्रोलिंग पर थी। पुलिस के अनुसार, जंगल में घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर भारी गोलीबारी की थी।

राज्य सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378(1) के तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दक्षिण बस्तर द्वारा 7 जनवरी 2013 को सुनाए गए फैसले को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने आरोपियों को आईपीसी की धारा 148, 120बी, 396, शस्त्र अधिनियम की धारा 25 और 27 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं के तहत बरी कर दिया था।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने दलील दी कि निचली अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की। उन्होंने आरोपी बरसे लखमा के धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिए गए कथित इकबालिया बयान, पाइप बम और विस्फोटक सामग्री की बरामदगी तथा घायल सीआरपीएफ जवानों की गवाही को महत्वपूर्ण बताया। राज्य ने यह भी कहा कि सात घायल जवानों की गवाही के लिए दायर आवेदन को खारिज करना गंभीर त्रुटि थी।

हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि अभियुक्तों को सीधे अपराध से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य या प्रत्यक्षदर्शी गवाही मौजूद नहीं थी। किसी गवाह ने आरोपियों की पहचान नहीं की। कोर्ट ने यह भी माना कि कथित इकबालिया बयान स्वतंत्र साक्ष्यों से पुष्ट नहीं था। जब्त विस्फोटक सामग्री घटना स्थल से मिली थी, न कि आरोपियों के कब्जे से। साथ ही एफएसएल रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई, जिससे जब्ती का प्रमाण कमजोर हो गया।

डिवीजन बेंच ने जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि मामले में फोरेंसिक और तकनीकी साक्ष्यों का अभाव रहा, महत्वपूर्ण गवाहों की पहचान और जांच नहीं हुई तथा आरोपियों को अपराध से जोड़ने वाले प्राथमिक प्रमाण जुटाने में एजेंसियां विफल रहीं। अदालत ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने जिन आरोपियों की दोषमुक्ति बरकरार रखी है उनमें ओयामी गंगा, माडवी दुला, पोदियामी हिड़मा, ओयामी हिड़मा, कवासी बुथरा, हुर्रा जोगा, बरसे लखमा, मड़कम गंगा, राजेश नायक और करतम जोगा शामिल हैं।