रायपुर। पश्चिम बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की अहम भूमिका रही है। राज्य की 16 ST आरक्षित सीटों में भाजपा ने सभी पर जीत दर्ज की, जिससे राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए।
साय फैक्टर बना बड़ा असर
चुनाव प्रचार में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सक्रिय भूमिका को भाजपा की जीत का बड़ा कारण माना जा रहा है। पार्टी रणनीति के तहत उन्हें पश्चिम बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में उतारा गया, जहां उन्होंने आदिवासी बहुल इलाकों में प्रचार किया।
झारग्राम, बिनपुर, नयाग्राम और गोपीबल्लवपुर जैसे क्षेत्रों में सीएम साय ने रैलियां, रोड शो और जनसभाएं कीं। इन इलाकों में आदिवासी वोटरों पर उनके प्रभाव को भाजपा के पक्ष में निर्णायक माना जा रहा है।
वोट स्विंग और चुनाव परिणाम
बताया जा रहा है कि जिन सीटों पर मुख्यमंत्री साय ने प्रचार किया, वहां भाजपा को 2 से 5 प्रतिशत तक वोट स्विंग देखने को मिला। परिणामस्वरूप भाजपा उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की—
- झारग्राम से लक्ष्मीकांत साहू: 38,147 वोटों से जीत
- नयाग्राम से अमिय किस्कू: 6,424 वोटों से जीत
- गोपीबल्लवपुर से राजेश महाता: 26,675 वोटों से जीत
- बिनपुर से डॉ. प्रनत टूडू: 22,977 वोटों से जीत
जंगल महल में राजनीतिक बदलाव
जंगल महल क्षेत्र कभी वामपंथ का गढ़ और बाद में टीएमसी का मजबूत आधार रहा है। लेकिन इस चुनाव में भाजपा ने यहां बड़ी सेंध लगाई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आदिवासी वोटों का झुकाव इस बार भाजपा की ओर रहा।
छत्तीसगढ़ मॉडल का असर
भाजपा ने चुनाव प्रचार में छत्तीसगढ़ की योजनाओं का भी उपयोग किया। महिलाओं को मासिक सहायता देने की रणनीति को छत्तीसगढ़ की “महतारी वंदन योजना” से प्रेरित बताया जा रहा है, जिसने बंगाल में भी प्रभाव डाला।
राजनीतिक हलचल तेज
इन नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल बढ़ गई है और भाजपा इसे संगठनात्मक और रणनीतिक जीत के रूप में देख रही है।





