July 31, 2026

‘मैं अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं कर सकता’, वंदे मातरम् बिल पर संसद से लेकर सियासत तक गरमाए ओवैसी

नई दिल्ली। राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 (National Honour (Amendment) Bill, 2026) यानी ‘वंदे मातरम् बिल’ संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस विधेयक का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि वह मुस्लिम हैं और अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं कर सकते। उनके मुताबिक, वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने का प्रयास संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन है।

गौरतलब है कि यह विधेयक 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पारित हुआ। सरकार का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की तरह कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। अब इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून के रूप में लागू होगा।

संसद से बिल पारित होने के बाद ओवैसी ने कहा कि यदि वह अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत करेंगे तो यह उनके मजहब के खिलाफ होगा। उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने और पूजा-पद्धति अपनाने का अधिकार देता है, इसलिए किसी को उसकी आस्था के विरुद्ध कोई कार्य करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

ओवैसी ने ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम्’ की प्रकृति में अंतर बताते हुए कहा कि राष्ट्रगान देश और उसके नागरिकों के सम्मान का प्रतीक है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ में देवी-देवताओं की आराधना का भाव निहित है। उनके अनुसार, दोनों की प्रकृति अलग है और इन्हें समान आधार पर नहीं रखा जा सकता।

राष्ट्रीय गीत के दर्जे पर भी उठाए सवाल

एआईएमआईएम प्रमुख ने यह भी कहा कि वर्ष 1950 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा देने के निर्णय पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उनका दावा है कि इस संबंध में संसद में कोई औपचारिक प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था। साथ ही उन्होंने कहा कि संविधान में ‘राष्ट्रीय गीत’ की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।

ओवैसी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस विधेयक के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 में निहित धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों को प्रभावित कर रही है। उनका कहना है कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कोई कार्य करने के लिए बाध्य करना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।