बिलासपुर में एक 26 वर्षीय मानसिक दिव्यांग युवती की सौतेली मां द्वारा उसकी अभिभावक (गार्जियन) बनने के लिए 2022 से कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। मामले में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को लोकल कमेटी के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है।
जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने युवती की सगी मां के निधन के बाद 15 दिसंबर 2012 को उसके पिता से विवाह किया था। वैवाहिक विवाद के चलते वह सौतेली पुत्री को लेकर मनेन्द्रगढ़ स्थित अपने मायके में रहने लगी। याचिकाकर्ता का दावा है कि वह युवती की सगी मां से भी अधिक देखभाल करती है और युवती भी उसके साथ रहना चाहती है।
बताया गया कि अक्टूबर 2022 में जैविक पिता मनेन्द्रगढ़ पहुंचा और युवती को अपने साथ ले जाने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप के कारण वह सफल नहीं हो सका। इसके बाद सौतेली मां ने बेटी की विधिवत अभिभावक बनने के लिए परिवार न्यायालय में आवेदन किया।
परिवार न्यायालय ने आवेदन को खारिज करते हुए कहा कि नेशनल ट्रस्ट फॉर वेलफेयर ऑफ पर्सन्स विद ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मेंटल रिटार्डेशन एंड मल्टीपल डिसएबिलिटीज एक्ट, 1999 की धारा 14(1) के तहत ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार उसके पास नहीं है। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने भी कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी, लेकिन दिव्यांग व्यक्तियों के कल्याण के लिए गठित लोकल कमेटी के समक्ष आवेदन करने की छूट प्रदान की। साथ ही कमेटी को निर्देश दिया गया है कि वह कानून के अनुसार मामले में निर्णय ले।
मामले में सौतेली मां की ओर से अपनी देखरेख में रह रही दिव्यांग पुत्री के हितों की सुरक्षा के लिए अभिभावक नियुक्त करने की मांग की गई है।





