रायपुर। छत्तीसगढ़ में जबरन और प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाया गया छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 अब कानून बन गया है। विधानसभा से पारित होने के बाद राज्यपाल के हस्ताक्षर उपरांत इसे राजपत्र में प्रकाशित कर लागू कर दिया गया है।
यह विधेयक 19 मार्च को छत्तीसगढ़ विधानसभा में उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया था। विस्तृत चर्चा के बाद इसे पारित किया गया, जिसका उद्देश्य राज्य में धर्मांतरण से संबंधित गतिविधियों को नियंत्रित करना और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करना है।
सरकार का कहना है कि वर्ष 1968 से लागू पुराने प्रावधान वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त नहीं थे। बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण से जुड़े विवादों के कारण कई बार सामाजिक तनाव और कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हुई। ऐसे में एक स्पष्ट और प्रभावी कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई।
नए कानून के तहत धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया गया है। अब किसी भी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन से पहले अधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन देना होगा। इसके बाद निर्धारित समय-सीमा में इसकी सूचना सार्वजनिक की जाएगी और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। जांच पूरी होने के बाद ही धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
इसके साथ ही धर्मांतरण कराने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य किया गया है। उन्हें हर वर्ष संबंधित प्राधिकृत अधिकारी को विस्तृत रिपोर्ट देनी होगी। ग्राम सभा को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है, जिससे स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा से धर्म चुनने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह परिवर्तन किसी दबाव, प्रलोभन या भय के कारण नहीं होना चाहिए। विवाह को धर्मांतरण का आधार नहीं माना गया है और विवाह के बाद भी धर्म परिवर्तन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होगा।
अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए विधेयक में कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। सामान्य मामलों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और न्यूनतम 5 लाख रुपये जुर्माना तय किया गया है। वहीं महिलाओं, अनुसूचित जाति-जनजाति और नाबालिगों के मामलों में सजा 10 से 20 वर्ष तक और जुर्माना 10 लाख रुपये तक हो सकता है। सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास और न्यूनतम 25 लाख रुपये जुर्माना का प्रावधान किया गया है।
इसके अलावा प्रलोभन, भय या धन के माध्यम से धर्मांतरण कराने पर भी कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। पुनरावृत्ति की स्थिति में आजीवन कारावास तक की सजा दी जा सकती है।
कानून में पीड़ितों के लिए प्रतिकार व्यवस्था भी की गई है। यदि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन दबाव या धोखे से किया गया हो, तो उसे पीड़ित मानते हुए न्यायालय आरोपी को क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे सकता है।
इस अधिनियम के तहत मामलों की जांच उप निरीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जाएगी, जबकि सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय अधिसूचित किए जाएंगे।
राज्य सरकार का दावा है कि इस कानून के लागू होने से अवैध धर्मांतरण पर रोक लगेगी और समाज में समरसता बनाए रखने में मदद मिलेगी।





