May 14, 2026

IGKV में नियुक्ति घोटाले का आरोप, अस्थायी कर्मचारियों को बनाए प्रोफेसर-डीन, 50 करोड़ का बोझ

रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) में नियुक्तियों और पदोन्नतियों को लेकर बड़े घोटाले के आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि अस्थायी और प्रोजेक्ट-बेस्ड कर्मचारियों को नियमों को दरकिनार कर सीधे प्रोफेसर, डीन और यहां तक कि कुलपति जैसे उच्च पदों पर नियुक्त कर दिया गया, जिससे विश्वविद्यालय पर हर साल करीब 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ रहा है।

मामला कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से जुड़े कर्मचारियों का है, जहां ट्रेनिंग एसोसिएट और जूनियर वैज्ञानिक जैसे अस्थायी पदों पर कार्यरत लोगों को उच्च शैक्षणिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंप दी गईं। दस्तावेजों के मुताबिक ये कर्मचारी न तो विश्वविद्यालय के नियमित संवर्ग में आते हैं और न ही राज्य शासन के अधीन, इसके बावजूद इन्हें बिना प्रशासनिक स्वीकृति के पदोन्नत किया गया।

जांच में वेतन संबंधी गंभीर विसंगतियां भी सामने आई हैं। जिन पदों पर 1 से 1.5 लाख रुपये मासिक वेतन निर्धारित है, वहां 3 से 4 लाख रुपये तक का भुगतान किया जा रहा है। यह कथित अनियमितता लंबे समय से जारी है और इससे विश्वविद्यालय की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है।

आरोपों के केंद्र में कुछ प्रमुख नाम भी सामने आए हैं। डॉ. राजेंद्र लाखपाले, जिन्हें ट्रेनिंग एसोसिएट से प्रोफेसर और फिर कुलपति पद तक पहुंचाया गया, उनके प्रमोशन में वेतन आयोग की गाइडलाइंस के उल्लंघन के आरोप हैं। वहीं विवेक त्रिपाठी, जो तकनीकी अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए थे, वर्तमान में अनुसंधान संचालक के पद पर हैं। इसी तरह डॉ. रतना नशीने को जूनियर वैज्ञानिक से डीन बनाए जाने पर भी सवाल उठे हैं।

सूत्रों के अनुसार, ऐसे 100 से अधिक कर्मचारियों को इसी तरह नियमों को नजरअंदाज कर उच्च पदों पर समायोजित किया गया है, जिससे न केवल वित्तीय अनियमितताएं बढ़ी हैं बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ने की आशंका है।

नियमों के अनुसार KVK कर्मचारी प्रोजेक्ट-बेस्ड होते हैं और उनकी सेवाएं उसी प्रोजेक्ट तक सीमित रहती हैं। उन्हें न तो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के नियमित कर्मचारियों के बराबर माना जा सकता है और न ही राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के स्थायी शिक्षकों के समकक्ष।

मामले की शिकायत के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। कृषि मंत्री राम विचार नेताम ने कहा है कि मामला संज्ञान में है और अधिकारियों से चर्चा के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के तहत ही की गई हैं।

यह मामला अब पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है कि बिना स्वीकृति के इतनी बड़ी संख्या में पदोन्नतियां कैसे हुईं और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। अब देखना होगा कि जांच आगे बढ़ती है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।