छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ क्षेत्र में अब हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। जहां कभी बंदूक की आवाज और डर का माहौल था, वहां अब विकास की रोशनी पहुंचने लगी है। नारायणपुर जिले के दूरस्थ गांवों में अब राशन ट्रैक्टर के जरिए सीधे पहुंचाया जा रहा है, जिससे ग्रामीणों के जीवन में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
दशकों तक विकास से दूर रहा अबूझमाड़

घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और दुर्गम रास्तों से घिरा अबूझमाड़ क्षेत्र वर्षों तक नक्सल प्रभाव में रहा। इस दौरान सड़क, पुल, स्कूल और राशन जैसी बुनियादी सुविधाएं या तो नहीं पहुंच पाईं या फिर नक्सली दबाव के कारण बाधित रहीं।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले यह क्षेत्र “समानांतर व्यवस्था” के तहत चलता था, जहां विकास कार्यों को आईईडी धमाकों और धमकियों के कारण रोक दिया जाता था।
राशन के लिए संघर्ष भरा जीवन
पहले ग्रामीणों को 35 किलो चावल के लिए 50 से 60 किलोमीटर तक पैदल यात्रा करनी पड़ती थी। यह सफर 2 से 3 दिन तक चलता था।

रास्ते में नदी-नाले पार करना, जंगली जानवरों का खतरा और नक्सलियों का डर—सब मिलकर जीवन को बेहद कठिन बना देते थे। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि कई बार उन्हें मिलने वाला राशन भी नक्सलियों को देना पड़ता था।
ढोढरबेड़ा गांव: दर्दनाक अतीत की गवाही
जिला मुख्यालय से करीब 85 किलोमीटर दूर स्थित ढोढरबेड़ा गांव उस दौर का जीवंत उदाहरण है।
वर्ष 1997-98 में यहां पीडीएस गोदाम बनाया गया था, लेकिन नक्सली दबाव के चलते दो साल में ही इसे बंद करना पड़ा। इसके बाद ग्रामीणों को 20 किलोमीटर दूर ओरछा तक पैदल जाना पड़ता था।
आज भी पुराने पीडीएस भवन की दीवारों पर लिखे नारे उस भयावह अतीत की गवाही देते हैं।
अब गांव-गांव पहुंच रहा राशन
अब स्थिति बदल चुकी है। प्रशासन की पहल और सुरक्षा बलों की मौजूदगी से अब पीडीएस राशन ट्रैक्टर के जरिए सीधे गांवों तक पहुंचाया जा रहा है।
नारायणपुर जिले के 18 से अधिक गांवों में यह व्यवस्था लागू की जा चुकी है। इससे ग्रामीणों को लंबी दूरी तय करने की परेशानी से राहत मिली है।
सुरक्षा बलों और प्रशासन की भूमिका
इस बदलाव में सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी और पुलिस कैंपों की स्थापना ने अहम भूमिका निभाई है।

केंद्र सरकार की नक्सल विरोधी रणनीति और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता से क्षेत्र में धीरे-धीरे भरोसा बढ़ा है। नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन की पहल से राशन वितरण व्यवस्था को मजबूत किया गया है।

ग्रामीणों की जुबानी बदलता अबूझमाड़
ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें राशन के लिए दूर नहीं जाना पड़ता। पहले जहां 3 दिन लगते थे, अब गांव में ही सुविधा मिल रही है।
मितानिन, सेल्समैन और आश्रम संचालकों ने भी बताया कि पहले भय और कठिनाई के बीच काम करना पड़ता था, लेकिन अब हालात काफी बेहतर हो गए हैं।
शिक्षा और अन्य सुविधाओं में भी सुधार

अब कई गांवों में स्कूल, आश्रम और आंगनबाड़ी केंद्र शुरू किए जा रहे हैं। बच्चों को किताबें, स्टेशनरी और अन्य सामग्री भी सुरक्षा बलों द्वारा उपलब्ध कराई जा रही है।
चुनौतियां अभी भी बाकी
हालांकि स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अबूझमाड़ में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं को पूरी तरह विकसित करना अभी बाकी है।
अबूझमाड़ की यह कहानी डर से भरोसे और अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ते बदलाव की मिसाल है। दशकों बाद यहां विकास की शुरुआत हुई है, लेकिन असली मंजिल अभी दूर है।





