कोरबा। Chhattisgarh के Korba जिले में जहां एक ओर होली पर रंग-गुलाल और फाग गीतों की धूम रहती है, वहीं धमनागुड़ी और खरहरी गांवों में इस पर्व का नजारा बिल्कुल अलग होता है। यहां न तो होलिका दहन किया जाता है और न ही रंग-गुलाल खेला जाता है।
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा पूर्वजों की आस्था और मान्यता से जुड़ी है। गांव में लोग शांतिपूर्वक पूजा-पाठ कर त्योहार मनाते हैं, लेकिन अग्नि प्रज्वलन और रंग खेलने की परंपरा नहीं निभाई जाती। यही वजह है कि दोनों गांवों की यह अनोखी व्यवस्था पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी रहती है।
अनहोनी के डर से नहीं खेलते होली
धमनागुड़ी और खरहरी के ग्रामीणों का मानना है कि गांव में होली खेलने से अनहोनी की आशंका बढ़ जाती है। इसी कारण वर्षों से यह परंपरा कायम है। ग्रामीणों का कहना है कि त्योहार का आनंद केवल रंगों और उत्सव में ही नहीं, बल्कि शांति और श्रद्धा में भी निहित है।
100 सालों से नहीं मनाई होली
धमनागुड़ी निवासी गनपत सिंह कंवर के मुताबिक उनकी उम्र लगभग 75 वर्ष है और बचपन से उन्होंने गांव में होली खेलते नहीं देखा। ग्रामीणों का दावा है कि करीब 100 वर्षों से यहां न तो होलिका दहन हुआ है और न ही रंग-गुलाल खेला गया है, हालांकि पर्व की धार्मिक मान्यता पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
होली मनाने की कोशिश, घर में लगी आग
खरहरी निवासी तामेश्वर सिंह पैकरा बताते हैं कि लगभग नौ वर्ष पहले एक परिवार ने गांव में होली मनाने का प्रयास किया था। रंग खेलने के कुछ समय बाद उनके घर में अचानक आग लग गई। इस घटना के बाद गांव में होली खेलने की परंपरा पूरी तरह बंद कर दी गई।
बाहर खेलकर आने वालों से पूछताछ
ग्रामीणों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बाहर जाकर होली खेलकर लौटता है, तो गांव में प्रवेश से पहले उससे रंग खेलने के बारे में पूछा जाता है। इसे गांव की सुरक्षा और परंपरा से जुड़ी चेतावनी माना जाता है।
धमनागुड़ी और खरहरी की यह परंपरा दर्शाती है कि त्योहार केवल रंगों और उल्लास तक सीमित नहीं होते, बल्कि आस्था, परंपरा और सामुदायिक विश्वास भी उनकी पहचान बनते हैं। यही कारण है कि यह अनूठी परंपरा आज भी कायम है और लोगों के लिए आस्था का विषय बनी हुई है।





