बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। नियुक्तियों में नियमों के पालन नहीं होने और पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति पी. पी. साहू की बेंच ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
याचिका राजनांदगांव निवासी प्रदीप शर्मा द्वारा अपने अधिवक्ता अली असगर के माध्यम से दायर की गई है। इसमें आरोप लगाया गया है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में कई गंभीर अनियमितताएं हुई हैं, जिससे पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
याचिका में कहा गया है कि नियुक्ति के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा नमित शर्मा और अंजलि भारद्वाज मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया। जबकि सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस तरह की नियुक्तियों की प्रक्रिया पर निगरानी रखता है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि वर्ष 2024 में दो उम्मीदवारों को पहले अयोग्य घोषित किया गया था, लेकिन महज छह महीने के भीतर उन्हें योग्य मानते हुए सूचना आयुक्त के पद पर चयनित कर लिया गया। इसे प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का बड़ा उदाहरण बताया गया है।
इसके अलावा, मुख्य सूचना आयुक्त पद के एक उम्मीदवार का इंटरव्यू उनके अधीनस्थ अधिकारियों, जिनमें अतिरिक्त मुख्य सचिव और सर्च कमेटी के सदस्य शामिल थे, द्वारा लिए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि यह प्रशासनिक दृष्टि से उचित नहीं है।
अन्य राज्यों जैसे तमिलनाडु और महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए याचिका में उल्लेख किया गया है कि वहां सर्च कमेटी का अध्यक्ष रिटायर्ड हाईकोर्ट जज को बनाया जाता है, जबकि छत्तीसगढ़ में पूरी समिति ब्यूरोक्रेट्स से बनी हुई थी।
याचिका में यह भी बताया गया है कि संबंधित अधिकारी ने मुख्य सचिव पद पर रहते हुए ही मुख्य सूचना आयुक्त के पद के लिए इंटरव्यू दिया, भले ही इसके लिए उन्होंने विभागीय अनुमति और अवकाश लिया हो, लेकिन यह प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी, जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।





